पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextपंचकोशविवेक का संक्षेप १९
इस पसारे का दीखना सवा सोलह आने इसके दीखने के अधीन
है। यों इस सारे जगत् का साक्षी जो ज्ञानरूप आत्मा है वह
शुद्ध अवस्था में तब ही दीख सकेगा जब कि इन पांचों कोशों का
परित्याग पूर्णतया कर दिया जायगा। अर्थात् इनको आत्मा
समझना छोड़ दिया जायगा। इन सब कोशों को चमकाने वाला
जो ज्ञान नाम का प्रकाश है, वही तो हमारा अपना स्वरूप है।
अविचारपूर्ण दृष्टि के रहते रहते ही दीख पड़नेवाले देहादियों
को जब अनात्मा समझ लिया जाता है, तब विचारक के सामने
आत्मतत्व स्वयमेव आ खड़ा होता है। उस समय उसको चाहो
'तो 'कुछ नहीं' कह दो या 'आत्मा' कह दो या कुछ भी मत कहो।
आत्मतत्व का वर्णन करने में अध्यात्मशास्त्र ने 'नेति नेति' की
निराली भाषा का उपयोग इसी भाव से किया है। सम्प्रदायवाले
इस प्रकरण में एक गाथा कहा करते हैं—किसी मेले में कोई स्त्री
पुरुष बिछड़ गये थे। राज-पुरुषों ने सारे मेले को घेरकर एक द्वार
में से निकाला और द्वार पर खड़ी की हुई स्त्री से पूछते गये कि
क्या यह तुम्हारा पुरुष है? वह सब का निषेध करती गयी 'कि
यह मेरा पुरुष नहीं है।' जब तो उसका पुरुष आया, तब वह
कुछ भी न बोली किन्तु चुपचाप खड़ी रह गयी। कुछ न बोल
कर ही उसने अपने पुरुष को राजपुरुषों को बता दिया। इसी
प्रकार जितना कुछ निषेध किया जा सकता है, उस सब ही का
निषेध कर देने पर, जो तत्व शेष रह जाता है, वही तो आत्मा
है। यही 'नेति नेति' का सरल भाव भी है। यों यह तत्व सत्य
पदार्थ है यह सिद्ध हो चुका। इसकी ज्ञानरूपता भी सिद्ध की
जा चुकी। यही तत्व अनन्त भी है—औरों का तो कहना ही
क्या है, सबसे तीव्र गति वाली कल्पना को भी यदि हजारों वर्ष