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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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[Header] पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ४१
ही होगा। असत् शब्द ही से यह प्रतीत होता है कि वह पदार्थ
है ही नहीं। इस कारण यह असत् पदार्थ तो उसका प्रतियोगी
[सम्बन्धी] हो ही नहीं सकता। फिर बताओ कि विजातीय
वस्तु से भी सद्वस्तु में भेद कैसे आयेगा ?
एकमेवाद्वितीयं सत् सिद्धमत्र तु केचन ।
विह्वला असदेवेदं पुरासीदित्यवर्णयन् ॥२६॥
इस प्रकार यहां तक यह सिद्ध हो गया कि सत् एक ही
अद्वितीय वस्तु है- [उस में स्वगत, सजातीय तथा विजातीय
किसी प्रकार का भी भेद नहीं है] परन्तु इस सद्वस्तु के विषय
में भी किन्हीं विह्वल [उन्मार्गगामी] पुरुषों ने यह कहा है कि
यह सब पहले असत् ही था अर्थात् था ही नहीं।
मग्नस्याब्धौ यथाक्षाणि विह्वलानि तथास्य धीः ।
अखण्डैकरसं श्रुत्वा निःप्रचारा बिभेत्यतः ॥२७॥
समुद्र में डूबे हुए पुरुष की इन्द्रियां जैसे व्याकुल हो
(घबरा) जाती हैं, इसी प्रकार इस अविचारशील असद्वादी का
मन, अखण्डैकरस वस्तु को सुन कर, निःप्रचार [गतिरहित]
होकर डरा करता है। [साकार वस्तु में जैसे मन चक्कर लगाया
करता है, समुद्र के समान अखण्ड एकरस वस्तु में वैसा विच-
रण करना नहीं मिलता। यही कारण है कि अपनी दुर्वासनावश
वे लोग इस सद्वस्तु को सुन कर चौंक उठते हैं।]
गौडाचार्या निर्विकल्पे समाधावन्ययोगिनाम् ।
साकारब्रह्मनिष्ठाना मत्यन्तं भयमूचिरे ॥२८॥
गौडाचार्य ने यह बात कही है कि इस निर्विकल्प समाधि में दूसरे
साकार ब्रह्म के उपासक योगियों को बहुत ही भय लगा करता है।