पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context५६२ पञ्चदशी
प्राप्त हो जाने पर जब इस प्राणी की वृत्ति अन्तर्मुख होती है
तब ] वह ब्रह्म उस अन्तर्मुख वृत्ति में निर्विघ्नता के साथ
[बेरोक टोक] प्रतिबिम्बित हो जाता है [ तभी उस प्राणी को
सुख होता है । ]
सत्ता चितिः सुखं चेति स्वभावा ब्रह्मणस्त्रयः ।
मृच्छिलादिषु सत्तैव व्यज्यते नेतरद् द्वयम् ॥२०॥
'सत्ता' 'चैतन्य' तथा 'आनन्द' ये तीन ही तो ब्रह्म के
स्वभाव हैं। मिट्टी और पत्थर आदि में ब्रह्म की सत्ता ही सत्ता
व्यक्त होती है। चैतन्य और सुख दोनों ही उनमें व्यक्त नहीं
होते ।
सत्ता चितिर्द्वयं व्यक्तं धीवृत्त्योर्घोरमूढयोः ।
शान्तवृत्तौ त्रयं व्यक्तं, मिश्रं ब्रह्मेत्थमीरितम् ॥२१॥
घोर और मूढ वृत्तियों में [ब्रह्म के] 'सत्ता' और 'चैतन्य'
नाम के दो स्वभाव व्यक्त हुए रहते हैं। शान्तवृत्तियों में तो
[ब्रह्म के] सत्ता चैतन्य तथा आनन्द ये तीनों ही स्वभाव
व्यक्त होते हैं। इस प्रकार मिश्र [अर्थात् प्रपंच-सहित ] ब्रह्म
का निरूपण किया गया ।
अमिश्रं ज्ञानयोगाभ्यां, तौ च पूर्वमुदीरितौ ।
आद्येऽध्याये योगचिन्ता ज्ञानमध्याययोर्द्वयोः ॥२२॥
यदि कोई चाहे तो ज्ञान और योग की चलनी में छानकर
उस ब्रह्म को अमिश्र अर्थात् प्रपंच से रहित कर सकता है।
उन ज्ञानयोगों का वर्णन पहले ही कर दिया गया है। पहले
अध्याय में योग का चिन्तन किया गया है। पिछले दो अध्यायों
में ज्ञान का वर्णन है।