पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५५३
बन्द होजायगा। जब तक किसी के कर्म क्षीण नहीं हो जायँगे
तब तक तो हज़ार ध्यान करने पर भी यह व्यवहार शान्त
नहीं हो सकेगा। तृप्तिदीप के २६३ वें श्लोक में विस्तारपूर्वक
व्याख्या की गयी है ।
विरलत्वं व्यवहृते रिष्टं चेद् ध्यानमस्तु ते ।
अवाधिकां व्यवहृतिं पश्यन् ध्यायाम्यहं कुतः ॥५१॥
यदि तुम व्यवहार को विरल [कम] करना चाहते हो तो
तुम्हारे लिये ध्यान करना ठीक है । परन्तु व्यवहार को अबाधक
देखता हुआ मैं भला ध्यान क्यों करूँ ? [ मुझे उसकी आवश्य-
कता ही क्या है ? ]
विक्षेपो नास्ति यस्मान्मे न समाधिस्ततो मम ।
विक्षेपो वा समाधिर्वा मनसः स्याद् विकारिणः ॥५२॥
क्योंकि मुझे कोई विक्षेप नहीं होता इसी से मुझे समाधि
भी नहीं होती है । देखो कि—विक्षेप और समाधि ये दोनों तो
विकारी मन को ही होते हैं ।
नित्यानुभवरूपस्य को मेऽत्रानुभवः पृथक् ।
कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्तमित्येव निश्चयः ॥५३॥
जो मैं नित्यानुभव रूप ही हूँ, उस मेरा पृथक् अनुभव क्या
होगा ? मुझे तो अब यह निश्चय हो गया है कि जो करना था
सो कर डाला और जो पाना था सो पा चुका हूँ ।
व्यवहारो लौकिको वा शास्त्रीयो वान्यथापि वा ।
ममाकर्तुरलेपस्य यथारब्धं प्रवर्तताम् ॥५४॥
लौकिक या शास्त्रीय या और किसी तरह का व्यवहार प्रारब्ध
के अनुकूल चलता रहे, मैं तो अकर्ता और अलेप ही रहता हूँ ।