पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextही है तो उसका उत्तर यह है कि-हां, अज्ञानी को भी 'सर्व-
कामावाप्ति' तो होती है परन्तु ज्ञान न होने के कारण उससे
उस [विचारे] की तृप्ति नहीं होती [ मैं सब बुद्धियों का साक्षी
हूँ ऐसा ज्ञान अज्ञानी को नहीं होता और वह उस तृप्ति से वंचित
रह जाता है ] यही बात तैत्तिरीय श्रुति में बहुत ही स्पष्ट शब्दों
में कही है कि— जो इस तत्व को पहचान जानता है उसी की
सब कामनायें पूरी हो जाती हैं। न जानने वाले तो केवल न
जानने से ही इस महालाभ से वञ्चित ही रह जाते हैं। यो वेद
निहितं गुहायां परमे व्योमन् सोश्नुते सर्वान् कामान् (तै० ब्र० १) ।
यद्वा सर्वात्मतां स्वस्य साम्ना गायति सर्वदा।
अहमन्नं तथान्नादश्चेति साम ह्यधीयते ॥३७॥
ज्ञानी की 'सर्वकामावाप्ति' का तीसरा भी एक प्रकार
है कि—वह ज्ञानी अपनी सर्वात्मकता [ सर्वरूपता ] को साम
के द्वारा यों गाया करता है। वह प्रत्येक वस्तु को अपना आत्मा
समझता है—वह जान जाता है कि मैं ही अन्न हूँ और मैं ही
अन्न को खाने वाला भी हूँ । सामवेद में भी कहा है कि—
अहमन्नमहमन्नमहमन्नमहमन्नादोहमन्नादोहमन्नादः। (तै० ३-१०) ऊपर
के श्लोक में साक्षिभाव से सर्वकामप्राप्ति का वर्णन है इस
श्लोक में सर्वात्मभाव से सर्वकामप्राप्ति का प्रतिपादन किया है।
दुःखाभावश्च कामाप्तिरुभे ह्येवं निरूपिते।
कृतकृत्यत्वमन्यच्च प्राप्तप्राप्यत्वमीक्षताम् ॥३८॥
यहां तक 'दुःखाभाव' और 'कामाप्ति' दोनों का निरूपण
किया जा चुका। अब आगे 'कृतकृत्यता' तथा 'प्राप्तप्राप्यता'
को भी समझ लो।