पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context‘विजातीय’। वृक्ष का स्वगत भेद अपने ही पत्ते फूल फल आदियों
से होता है। आम्र वृक्ष का सजातीय भेद अपने सजातीय
शिंशपा वृक्ष से होता है तथा उसी का विजातीय भेद पत्थर
आदि से होता है ॥२०॥ अन्यान्य पदार्थों में पाया जाने वाला
इस तरह का एक भी भेद इस सद्वस्तु में नहीं है। इन तीनों
तरह के भेद को हटाने के लिये ही इस श्रुति ने ये तीन पद कहे
हैं। वस्तुत्व रूपी समानता को देख कर अन्यान्य पदार्थों के
समान ही सद्रूप आत्मवस्तु में भी जब स्वगतादि तीनों भेदों की
प्रसक्ति होती है तब स्वगत भेद को ‘एकम्’ यह पद हटाता है,
सजातीय भेद को ‘एव’ यह पद दूर कर देता है, तथा विजातीय
भेद को ‘अद्वितीयम्’ यह तीसरा पद रहने नहीं देता।
सतो नावयवाः शङ्क्यास्तदंशस्यानिरूपणात् ।
नामरूपे न तस्यांशौ तयो रद्याप्यनुद्भवात् ॥२१॥
सद्वस्तु के भी अवयव होते हों, ऐसी शंका मत करना
क्योंकि उसके अंश का निरूपण हो ही नहीं सकता। नाम
और रूप [आकार] भी उसके अंश नहीं हैं। क्योंकि अभी तक
अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति के प्रथम तक, वे नाम रूप उत्पन्न
नहीं हो पाये हैं।
स्वगत-भेद मान सकने के लिये जिन अवयवों की आवश्य-
कता होती है वे अवयव तो सद्वस्तु में होते ही नहीं। क्योंकि उसके
अवयवों के स्वरूप का निरूपण—कि वे कैसे हैं—आज तक नहीं
हो सका है। यदि नाम रूप को उसके अंश मानो तो जब कि
अभी तक सृष्टि ही उत्पन्न नहीं हुई है तब ये सृष्टिकाल में होने
वाले नामरूप उस समय की शुद्ध सद्वस्तु के अंश कैसे हो ज़ायेंगे ?