पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextव्यक्त [ कार्य ] पदार्थ जब नष्ट भी हो जाते हैं तब भी
[उन कार्यों से अभिन्न] यह नाम, नाम लेने वाले आदमियों की
जिह्वा पर चढ़ा रह जाता है। अब तो वह व्यक्त [ कार्य ] पदार्थ
वाणी से लिये जाने वाले केवल उस नाम से ही निरूपणीय
[ व्यवह्रियमाण ] रह जाता है [ उसके व्यवहार का अब कोई
साधन नहीं रह जाता ] इस कारण वह तद्रूप [अर्थात्
नाम के ही रूप वाला किंवा नामात्मक ] कहलाने लगता है ।
भाव यह है कि—विवादास्पद जो घट है वह घटशब्द-
रूप ही होना चाहिये, क्योंकि उसका व्यवहार ठीक इसी प्रकार
घटशब्द से होता है जिस प्रकार घट इस शब्द का व्यवहार
घट शब्द से होता है। यों व्यक्त पदार्थ नामात्मक होते हैं।
निस्तत्त्वाद् विनाशित्वाद् वाचारम्भणनामतः ।
व्यक्तस्य न तु तद् रूपं सत्यं किञ्चिन्मृदादिवत् ॥४३॥
व्यक्त घटादि कार्यों का मोटा गोल आदि जो रूप [ या
आकार ] हमें दीखता है वह कुछ भी, जैसे मिट्टी सत्य है, वैसे
सत्य नहीं हैं। क्योंकि वह आकार तो निस्तत्त्व है [उसका वास्तव
रूप तो कुछ भी नहीं है ] विनाशी है [ मिट्टी के रहते रहते ही
वह तो नष्ट हो जाता है ] तथा वाणी से कहा हुआ एक शब्द
मात्र ही तो है। यदि यह आकार असत्य न होता तो जैसे मिट्टी
आदि निस्तत्त्व नहीं है, विनाशी नहीं है या केवल नाम मात्र ही
नहीं हैं ऐसे ही यह भी होते ।
व्यक्तकाले ततः पूर्वमूर्ध्वमप्येकरूपभाक् ।
सतत्त्वमविनाशं च सत्यं मृद्वस्तु कथ्यते ॥४४॥
व्यक्त पदार्थ की स्थिति के समय, व्यक्त पदार्थ की उत्पत्ति