पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextओम्
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम्
( अद्वैतबोध का उपाय )
सदद्वैतं श्रुतं यत्तत् पञ्चभूतविवेकतः ।
बोद्धुं शक्यं ततो भूतपञ्चकं प्रविविच्यते ॥१॥
श्रुतियों में जिस सत् अद्वैत का प्रतिपादन किया गया है
उसको पंचभूत विवेक से ही जान सकते हैं । इससे अब पाँचों
भूतों का विवेक किया जाता है ।
"सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' [ छा. ६-२-१ ]
इस श्रुति के द्वारा जगत् की उत्पत्ति से पहले, जगत् के कारण
जिस सद्रूप अद्वितीय ब्रह्म की सूचना हमें मिलती है, मन और
वाणी का विषय न होने के कारण उस ब्रह्म का सीधा ज्ञान
किसी को भी स्वतः नहीं हो सकता । इसलिये उसके कार्य
होने से उसकी उपाधि बने हुए पाँचों भूतों का विवेक करके ही
हम उसे जान सकते हैं। इसी से अब पाँच भूतों का विवेक किया
जाता है। यह पाँचों भूतों का विवेक उस ब्रह्म को जानने का
ही उपोद्घात है ।
शब्दस्पर्शौ रूपरसौ गन्धो भूतगुणा इमे ।
एकद्वित्रिचतुःपञ्चगुणा व्योमादिषु क्रमात् ॥२॥