पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context४७२ पञ्चदशी
ब्राह्मण्यं मेऽस्ति पूज्योऽहमिति तुष्यति पूजया ।
अचेतनाया जातेर्नो सन्तुष्टिः पुंस एव सा ॥१३॥
'मैं ब्राह्मण हूँ इसी से मैं पूजनीय हूँ' इस प्रकार ब्राह्मण्य-
निमित्तक पूजा से जो सन्तोष होता है, वह सन्तोष अचेतन
ब्राह्मण जाति को नहीं होता। वह सन्तोष तो [ ब्राह्मणपन के
अभिमानी ] पुरुष को ही होता है।
क्षत्रियोऽहं तेन राज्यं करोमीत्यत्र राजता ।
न जाते, वैश्यजात्यादौ योजनायेदमीरितम् ॥१४॥
'मैं क्षत्रिय हूँ, इसी से मैं राज करता हूँ' इसमें जो राज्य
भोग के कारण सुख होता है, वह क्षत्रियत्व जाति वाले पुरुष
को ही होता है। क्षत्रियत्व जाति को उसका कुछ भी सुख नहीं
होता [क्योंकि जाति तो जडपदार्थ है] वैश्यादि जातियों में भी
इसी प्रकार समझने के लिए उपलक्षण रूप में इनका नाम लिया
है। उनमें भी यही बात समझनी चाहिए।
स्वर्गलोकब्रह्मलोकौ स्तां ममेत्यभिवाञ्छनम् ।
लोकयोर्नोपकाराय, स्वभोगायैव केवलम् ॥१५॥
[कर्म और उपासना से] 'स्वर्ग या ब्रह्मलोकादि मुझे प्राप्त
हो जाय' यह जो वाञ्छा प्राणी को होती है, यह लोकों की
भलाई के लिए नहीं होती। यह तो केवल अपने भोग के लिए
होती है।
ईशविष्ण्वादयो देवाः पूज्यन्ते पापनष्टये ।
न तन्निष्पापदेवार्थं, तत्तु स्वार्थं प्रयुज्यते ॥१६॥
पाप की निवृत्ति के लिए जो ईश या विष्णु आदि देवता