पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४६३
में एक बार क्षण भर के लिए भी विश्राम पा लेता है तब फिर
वह बाहर लोकव्यवहार करता हुआ भी अन्दर अपने मन में तो
उसी आत्मतत्व का आस्वाद लिया करता है। [यों व्यवहार
करते हुए भी आत्मसाधन चल सकता है। अर्थात् व्यवहार
ज्ञान का विरोधी नहीं है।]
धीरत्वमक्षप्राबल्ये ध्यानन्दास्वादवाञ्छया ।
तिरस्कृत्याखिलाक्षाणि तच्चिन्तायां प्रवर्तनम् ॥१२४॥
[विषयों के सामने आने पर, विषयों की ओर को पुरुष
को खींच ले जाने का सामर्थ्य इन्द्रियों में है। यों] इन्द्रियों
की प्रबलता होने पर भी आत्मसुख का आस्वाद लेने की उदार
इच्छा से, जब सारी इन्द्रियों का तिरस्कार कर दिया जाय,
और आत्मानुसन्धान में ही प्रवृत्त हुआ जाय, तब यही 'धीर-
पना' कहाता है।
भारवाही शिरोभारं मुक्त्वास्ते विश्रमं गतः ।
संसारव्यावृतित्यागे तादृग्बुद्धिस्तु विश्रमः ॥१२५॥
बोझा उठाने वाला पुरुष थकाने वाले सिर के बोझे को
उतार कर जैसे श्रमरहित हो जाता है, इसी प्रकार संसार के
व्यापारों का परित्याग कर देने पर, जब किसी-को वैसी ही
बुद्धि हो जाय, कि मैं अब श्रमरहित हो गया हूँ—तब बस
इसी को 'विश्राम' कहा जाता है।
विश्रान्तिं परमां प्राप्त स्तवौदासीन्ये यथा तथा ।
सुखदुखदशायां च तदानन्दैकतत्परः ॥१२६॥
[जिस परम विश्रान्ति का वर्णन ऊपर किया है वह] परम
विश्रान्ति जिस पुरुष को मिल जाती है, वह पुरुष जिस तरह