पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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३० पञ्चदशी
में किये हुए प्रयत्न से, योगियों के अशुक्ल कृष्ण नामक कर्म के
प्रताप से [जिसको 'अदृष्ट' भी कहते हैं] तथा वार-वार समाधि
का अभ्यास करते रहने से उत्पन्न हुए भावना नाम के संस्कार
से बंधा रहता है, अर्थात् इन तीन कारणों से आत्माकार वृत्तियों
का प्रवाह बहता रहता है, चाहे उस समय उन वृत्तियों को पैदा
करने के लिये भले ही कोई प्रयत्न न भी किया जाता हो।
यथा दीपो निवातस्थ इत्यादिभिरनेकधा।
भगवानिममेवार्थमर्जुनाय न्यरूपयत् ॥ ५८ ॥
'यथा दीपो निवातस्थः [गीता] इत्यादि श्लोकों के द्वारा
अनेक प्रकार से भगवान् ने इसी निर्विकल्प समाधि रूपी अर्थ
को अर्जुन के प्रति निरूपण किया है [इससे इस समाधि को
अप्रामाणिक समझ लेने का कोई कारण नहीं रहता ]
अनादाविह संसारे संचिताः कर्मकोटयः ।
अनेन विलयं यान्ति शुद्धो धर्मो विवर्धते ॥ ५९ ॥
अनादिकाल से चलते आते हुए इस संसार में, संचित किये
हुए जो अनगिनत पुण्यापुण्य कर्मों के ढेर हैं वे इसी समाधि के
प्रताप से नष्ट होते हैं तथा इसी समाधि के प्रताप से शुद्ध धर्म
वृद्धि को प्राप्त होने लग जाता है [जिससे कि विलास (कार्य)
सहित अविद्या को हटाने वाला साक्षात्कार आ धमकता हैं]।
धर्ममेघमिमं प्राहुः समाधिं योगवित्तमाः ।
वर्षत्येष यतो धर्मामृतधाराः सहस्रशः ॥६०॥
योग के मर्मज्ञ लोग, [ जिन को ब्रह्म का साक्षात्कार हो
जाता है], इस निर्विकल्प समाधि को ही 'धर्ममेघ' अर्थात् धर्म
को बरसाने वाला कहते हैं। क्योंकि यह समाधि धर्मरूपी अमृत