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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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का जो जीव ब्रह्म की एकता रूपी अर्थ है उसका अनुसन्धान
[अन्वेषण] करना ही 'श्रवण' कहाता है। 'शब्दस्पर्शादयो वेद्या'
[ तत्त्वविवेक ३ ] इत्यादि से लेकर 'पराग्रात्मनोरैवं युक्त्या
संभावितैकता [ तत्त्वविवेक ४३ ] पर्यन्त श्लोकों के कहे प्रकार
से श्रवण किये हुए इसी अर्थ के संभावितपने का अनुसन्धान
[किंवा श्रवण किये हुए अर्थ की संभावना का मन में बैठाना]
'मनन' कहाता है ।
ताभ्यां निर्विचिकित्सेऽर्थे चेतसः स्थापितस्य यत् ।
एकतानत्वमेतद्धि निदिध्यासन मुच्यते ॥५४॥
श्रवण और मनन से जो अर्थ निःसंशय हो चुका है, उसी
अर्थ [विषय] में धारण किया हुआ चित्त, जब एकतान हो जाय
[जब उस चित्त में उसी विषय की एकाकार वृत्ति का प्रवाह बहने
लग पड़े] तब इसी को [योगशास्त्र में] 'निदिध्यासन' नाम से
कहा जाता है।
ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद् ध्येयैकगोचरम् ।
निवातदीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते ॥५५॥
क्रम से 'ध्याता' और 'ध्यान' को छोड़ कर, जब चित्त केवल
'ध्येय' को ही विषय कर लेता है, जब चित्त निवात स्थान में रखे
हुए दीपक की प्रभा के समान निश्चल हो जाता है तब यही
अवस्था 'समाधि' कहाती है।
'निदिध्यासन' में तो 'ध्याता' 'ध्यान' तथा 'ध्येय' ये तीनों
ही प्रतीत होते रहते हैं। परन्तु जब अभ्यास के प्रभाव से वही
चित्त क्रम से पहले तो 'ध्याता' और पीछे से 'ध्यान' को छोड़
देता है और 'ध्येयैकगोचर' हो जाता है