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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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४३२ पंचदशी
उस सुषुप्ति में यदि सुख ही नहीं है तो बड़े भारी प्रयासों
से कोमल शय्या आदि साधनों का उपार्जन क्यों किया जाता है ?
दुःखनाशार्थमेवैतदिति चेद् रोगिणस्तथा।
भवत्वरोगिण स्त्वेतत् सुखायैवेति निश्चिनु ॥४०॥
यदि कहो कि यह सब साधन संग्रह तो दुःखनाश के लिये
किया जाता है तो हम कहेंगे कि [दुःख नाश को इसका फल
कहना ठीक नहीं है। क्योंकि] यह फल तो केवल रोगी को ही
हो सकता है [जो अरोगी है उसके लिये क्या कहोगे ?] जब
कोई रोग ही नहीं है तब तो इन साधनों का सम्पादन सुख के
लिये ही है ऐसा निश्चय कर लो।
तर्हि साधनजन्यत्वात् सुखं वैषयिकं भवेत् ।
भवत्वेवात्र निद्रायाः पूर्वं शय्यासनादिजम् ॥४१॥
अच्छा सौषुप्त सुख को साधनजन्य मानोगे तो तुम्हें उस
को वैषयिक सुख मानना होगा। [फिर तुम उसे आत्मस्वरूप
कैसे कह सकोगे ?] इसका उत्तर यह है कि—निद्रा आने से
पहले पहले जो शय्या और आसनादि से सुख होता है उसे तो
हम भी वैषयिक सुख मानते हैं।
निद्रायां तु सुखं यत्तज्जन्यते केन हेतुना।
सुखाभिमुखधीरादौ पश्चान्मज्जेत् परे सुखे ॥४२॥
परन्तु निद्रा आजाने पर जो सुख होता है वह तो किसी
भी साधन से नहीं होता [क्योंकि उस समय उन शय्या आदि
साधनों का विचार ही किसी को नहीं रहता] निद्रा आने से पहले
पहले तो इस जीव की बुद्धि शय्या आदि से मिलने वाले सुखों
की तर्फ को रहती है। परन्तु निद्रा आजाने पर तो वही बुद्धि