पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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अन्धः सन्नप्यनन्धः स्याद्विद्धोऽविद्धोऽथ रोग्यपि।
अरोगीति श्रुतिः प्राह, तच्च सर्वे जना विदुः ॥३४॥
तस्माद्वा एतं सेतुं तीर्त्वान्धः सन्ननन्धो भवति विद्धः सन्नविद्धो
भवति उपतापी सन्ननुपतापी भवति (छ. ८-४-२) तद्यद्यपीदं भगवः
शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति (छ. ८-१०-३) इस श्रुति में
कहा गया है कि—सुषुप्ति के आ जाने पर अन्धा अन्धा नहीं
रहता, ज़खमी ज़खमी नहीं रहता, रोगी अरोगी हो जाता है।
[अर्थात् देहाभिमान के कारण उत्पन्न हुए दोष सुषुप्ति में भाग
जाते हैं] इस बात को सब लोग ही जानते हैं [कि—रोग से
पीडित भी पुरुष को जब सुषुप्ति आ जाती है तब उसे उस
के दुःख का अनुभव नहीं होता।]
न दुःखाभावमात्रेण सुखं लोष्टशिलादिषु ।
द्वयाभावस्य दृष्टत्वादितिचेद् विषमं वचः ॥३५॥
केवल दुःख के न होने से ही सुख की कल्पना करना ठीक
नहीं है। देखा जाता है कि—ढेले और पत्थर आदि में दोनों
का ही अभाव होता है [उन में जहां दुःख नहीं है, वहां
उनमें सुख भी तो नहीं है] इस का उत्तर यह है कि तुम्हारा
दृष्टान्त दाष्टन्तिक के अनुसार नहीं है]
मुखदैन्यविकासाभ्यां परदुःखसुखोहनम् ।
दैन्याद्यभावतो लोष्टे दुःखाद्यूहो न संभवेत् ॥३६॥
[दाष्टन्तिक के अनुसार न होने की बात भी देख लो
कि] दूसरे के दुःख और दूसरे के सुख की ऊहना
उस के मुख की दीनता और उसके मुख के विकास को देख
कर ही तो की जाती है