पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context४२८ पञ्चदशी
अद्वैतः प्रलयो द्वैतानुपलम्भेन सुप्तिवत् ।
इति चेत् सुप्तिरद्वैतेत्यत्र दृष्टान्तमीरय ॥२९॥
[पूर्ववादी कहता है कि अच्छा लो दृष्टान्त भी सुन लो]
प्रलय तो एक प्रकार का अद्वैत [अर्थात् द्वैत रहित अवस्था]
है। क्योंकि उस समय द्वैत की उपलब्धि नहीं होती। जिस
जिस में द्वैत की उपलब्धि नहीं होती वह वह सभी अद्वैत होता
है जैसे कि सुप्ति। इस पर हमारा कहना है कि सुप्ति अद्वैत
होती है इस बात को सिद्ध करने के लिये भी तुम्हें अन्य दृष्टान्त
देना पड़ेगा। [यदि तुम अपनी सुप्ति का दृष्टान्त दोगे तो उसे कोई
जानता नहीं। वह तो दूसरे के प्रति असिद्ध है। इस कारण उसकी
सिद्धि के लिये कोई और दृष्टान्त तुम्हें टटोलना ही पड़ेगा।]
दृष्टान्तः परसुप्तिश्चेदहो ते कौशलं महत् ।
यः स्वसुप्तिं न वेत्स्यस्य परसुप्तौ तु का कथा ॥३०॥
यदि तुम दूसरे की सुप्ति का दृष्टान्त दो 'सुप्तिरद्वैता पर-
सुप्तिवत्' तब तो यह तुम्हारी बड़ी [भद्दी] चतुराई है [क्योंकि
अप्रसिद्ध होने के कारण परसुप्ति का तो तुम्हें दृष्टान्त ही नहीं
देना चाहिये] भला जो तुम अपनी सुप्ति को भी नहीं जानते
हो वह तुम दूसरे की सुप्ति की बातें क्यों करते हो [जिसे
अपनी सुप्ति का ज्ञान नहीं है उसे परसुप्ति का ज्ञान भी नहीं
हो सकता।]
निश्चेष्टत्वात् परः सुप्तो यथाहमिति चेत् तदा ।
उदाहर्तुः सुषुप्तेस्ते स्वप्रभत्वं भवेद् बलात् ॥३१॥
यदि अनुमान से परसुप्ति को सिद्ध करना चाहो कि-
परः सुप्तः निश्चेष्टत्वात् अहमिव दूसरा सोया पड़ा है क्योंकि