पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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कर, इसी जन्म में हर्ष और शोक करना छोड़ देता है। नैनं
कृताकृते तपतः इस वाक्य में कहा गया है कि—किया
और बेकिया हुआ पुण्य तथा पाप इस ज्ञानी को तप्त
नहीं करता। एक प्रकार का चित्तविकार ही 'ताप' कहाता है।
जब पुण्य किया जाता है तब हर्ष रूपी विकार उत्पन्न होता है।
जब नहीं किया जाता तब विषाद् रूपी विकार होता है। इसके
विपरीत जब पाप का आचरण न हो तब हर्ष होता है जब हो
जाय तब विषाद होता है। तत्वज्ञानी में तो ये दोनों ही, दोनों
तरह के विकारों को उत्पन्न नहीं कर सकते। क्योंकि उस तत्व-
ज्ञानी को तो अविक्रिय ब्रह्मरूपता का परिज्ञान हो चुकता है।
भाव यह है कि—नव ज्ञानियों में इष्टानिष्ट की प्राप्ति या परि-
हार के लिये प्रवृत्ति दीखती भी हो परन्तु दृढ़ अपरोक्ष ज्ञान
जिन्हें हो जाता है उन्हें फिर हर्ष शोक नहीं होते। वे फिर इष्टा-
निष्ट की प्राप्ति या परिहार का उद्योग छोड़ बैठते हैं।
इत्यादि श्रुतयो बह्व्यः पुराणैः स्मृतिभिः सह ।
ब्रह्मज्ञानेऽनर्थहानि मानन्दं चाप्यघोषयन् ॥१०॥
ये ही नहीं, ऐसी बहुत सी श्रुतियें, स्मृतियें तथा पुराण,
इस बात की घोषणा कर रहे हैं कि ब्रह्मज्ञान से अनर्थ की हानि
और आनन्द की प्राप्ति होती है ।
आनन्दस्त्रिविधो ब्रह्मानन्दो विद्यासुखं तथा ।
विषयानन्द इत्यादौ ब्रह्मानन्दो विविच्यते ॥११॥
'ब्रह्मानन्द' 'विद्यानन्द' और 'विषयानन्द' यों तीन प्रकार
का आनन्द जानना चाहिये। [इनमें से पिछले दोनों आनन्द
ब्रह्मानन्दमूलक होते हैं इस लिये ] पहले