पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextतत्त्वविवेकप्रकरणम् २५
सविकल्प है अथवा निर्विकल्प है ? सविकल्प को लक्ष्य मानने
में महावाक्य का लक्ष्य ब्रह्म अवस्तु [मिथ्या] हो जायगा [क्यों-
कि वेदान्त मत में सविकल्प वस्तु मिथ्या हुआ करती है] अब
यदि निर्विकल्प को लक्ष्य कहें सो तो कहीं देखा नहीं गया और
न ऐसा सम्भव ही है। [क्योंकि लक्ष्य पदार्थ में रहनेवाला
'लक्ष्यत्व' भी तो एक विकल्प ही है]।
विकल्पो निर्विकल्पस्य सविकल्पस्य वा भवेत्।
आद्ये व्याहति रन्यत्रानवस्थात्माश्रयादयः ॥५०॥
उत्तर—अच्छा बताओ तुम्हारा यह विकल्प निर्विकल्प के
विषय में है ? या सविकल्प के विषय में है ? प्रथम पक्ष में
व्याघात दोष आता है [निर्विकल्प पर विकल्प कैसा ?] दूसरे
पक्ष में अनवस्था और आत्माश्रय आदि दोष आते हैं।
सिद्धान्ती प्रतिबन्दी से उत्तर देता है कि तेरे मत में सविकल्प
शब्द का क्या अर्थ है ? 'विकल्पेन सह वर्तते इति सविकल्पः' इस
विवरण से दो पदार्थ प्रतीत होते हैं एक तो आधेयविकल्प तथा
दूसरा उसका आधार विकल्प। इसमें यह प्रश्न होता है कि
तुम्हारे इस विकल्प का जो आधार है वह निर्विकल्प है या सवि-
कल्प है ? प्रथमपक्ष तो असम्भव ही है। क्योंकि विकल्प का
आधार होते हुए निर्विकल्प तो हो ही नहीं सकता। द्वितीय पक्ष
में यह बताओ कि वह किस विकल्प से सविकल्प है, तृतीयान्त
पदवाच्य जो प्रथम विकल्प है उसीसे सविकल्प है अथवा किसी
दूसरे विकल्प से ? प्रथम पक्ष में आत्माश्रय दोष है। क्योंकि
विकल्प का आधार सविकल्प पदार्थ है, विशिष्ट की आधारता
विशेषण में भी हुआ करती है। जैसे कि आसन वाले भूतल पर