पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextवर्णाश्रमपरान् मूढा निन्दन्त्वित्युच्यते यदि ।
देहात्ममतयो बुद्धं निन्दन्त्वाश्रममानिनः ॥११३॥
यदि यह कहो कि मूढ [ अर्थात् विषयलम्पट और पामर ]
लोगों की निन्दा से वर्णाश्रम धर्म को पालने वाले [ कर्मी ]
की कुछ हानि नहीं होती है । फिर वे भले ही उनकी निन्दा
करते रहें, तो हम कहेंगे कि—देह को ही आत्मा मानने वाले,
आश्रमों का अभिमान करने वाले, कर्मी लोग तत्वज्ञानी की
निन्दा भी भले ही किया करें, उसकी भी उससे कुछ भी हानि
नहीं हो सकती ।
तदित्थं तत्वविज्ञाने साधनानुपमर्दनात् ।
ज्ञानिनाचरितुं शक्यं सम्यग् राज्यादि लौकिकम् ॥११४॥
[ प्रकृत बात तो यही हुई कि ] उक्त रीति से तत्वज्ञान हो
जाने के बाद लौकिक व्यवहार जिन मन आदि साधनों से
चलता है, उनका उपमर्द किंवा विनाश नहीं हो जाता, इस
लिये तत्वज्ञानी लोग लौकिक राज्य [ उस जैसे बड़े-बड़े काम
भी] भले प्रकार चला ही सकते हैं। [ज्ञानी होने का यह अभि-
प्राय कदापि नहीं है कि ज्ञानी पुरुष निकम्मा होकर क्षयरोगी
की तरह हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाय या कहीं एकान्त गुफ़ा
में ही जा पड़े। जिन लोगों का विचार यह है कि ज्ञान हो जाने
पर तो कुछ काम हो ही नहीं सकता । वे तो तत्वज्ञान को
एक प्रकार का पक्षाघात रोग मानते हैं। ज्ञान तो मन की एक
उच्चतम अवस्था है । शरीर आदि के व्यापारों पर उसका कुछ
भी प्रभाव नहीं पड़ता । ज्ञान हो जाने पर भी शरीर आदि के
व्यापार ज्यों के त्यों चलते रह सकते हैं । ज्ञान होने पर केवल