पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context३८८ पञ्चदशी
अज्ञता उस पर विधि का जोर नहीं चलने देती] तो हम कहेंगे
कि ज्ञानी सब कुछ जानता है [उसकी सर्वज्ञता उस पर विधि
का अंकुश नहीं रखने देती] देखो विधि के अधिकार की बात
तो इतनी ही है कि—जो अल्पज्ञ है, उसी के लिए ये विधि
और निषेध शास्त्र बनाये गये हैं। अज्ञ और सर्वज्ञ के लिए
विधि या निषेध कुछ भी नहीं होता।
शापानुग्रहसामर्थ्यं यस्यासौ तत्वविद् यदि ।
तन्न, शापादिसामर्थ्यं फलं स्यात्तपसो यतः ॥१०८॥
यदि कहो कि—ऐसा भी क्या तत्वज्ञानी, जो किसी को
शाप या वरदान तक न दे सके ? जिसमें ये दोनों सामर्थ्य हों
लोक में तो उसी को तत्वज्ञानी [या पहुँचा हुआ महात्मा] सम-
झते हैं। यह विचार ठीक नहीं है। क्योंकि शापादि सामर्थ्य
तो उनके तप का फल है [यह कोई तत्वज्ञान का फल नहीं है]
व्यासादेरपि सामर्थ्यं दृश्यते तपसो बलात् ।
शापादिकारणा दन्यत् तपो ज्ञानस्य कारणम् ॥१०९॥
यदि कहो कि व्यास जैसे तत्वदर्शी में भी शापानुग्रह-
सामर्थ्य [ शाप और वरदान की शक्ति ] था तो हम कहेंगे कि
उनमें वह सामर्थ्य ज्ञान के कारण नहीं था। वह तो उनके
तपोबल से था। तप भी दो प्रकार का होता है—एक तप
तत्व ज्ञान का कारण है, दूसरे तप से शाप और अनुग्रह का
सामर्थ्य उत्पन्न होता है।
द्वयं यस्यास्ति तस्यैव सामर्थ्यज्ञानयोर्जनिः ।
एकैकं तु तपः कुर्वन्नेकैकं लभते फलम् ॥११०॥