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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 404

एवं ध्यानैकनिष्ठोऽपि लेशाल्लौकिकमारभेत् ।
तत्ववित्त्वविरोधित्वाल्लौकिकं सम्यगाचरेत् ॥८७॥
उस नारी के समान ध्यानैकनिष्ठ पुरुष भी अपने लौकिक
कामों को अधूरे तौर पर करते रहते हैं । व्यवहार तत्वज्ञान का
विरोधी नहीं होता, इस कारण तत्वज्ञानी लोग तो लौकिक
कार्यों को भी भले प्रकार निभा ले जाते हैं [ ज्ञानी होते ही
लौकिक व्यवहार छुट जाता है, या छोड़ देना चाहिये, ऐसा
विचार भ्रमपूर्ण है । ज्ञानी लोगों के व्यवहार तो और लोगों
से उत्तम प्रकार के होने चाहियें । उनका व्यवहार दूसरों के
लिये आदर्श का काम दे, ऐसा होना चाहिये ] ।
मायामयः प्रपंचोऽय मात्मा चैतन्यरूपधृक् ।
इति बोधे विरोधः को लौकिकव्यवहारिणः ॥८८॥
जो तत्व ज्ञानी ऐसा समझकर लौकिक व्यवहार करता है
कि—यह प्रपंच तो मायामय है, आत्मतत्व तो केवल चैतन्य
रूप है, फिर बताओ कि उसे व्यवहार का विरोध कैसे होगा ?
अपेक्षते व्यवहृति र्न प्रपंचस्य वस्तुताम् ।
नाप्यात्मजाड्यं, किंन्त्वेषा साधनान्येव कांक्षति ॥८९॥
व्यवहार को न तो यही ज़रूरत है कि—'प्रपंच सच्चा ही
हो' न वह यही चाहता है कि 'आत्मा जड ही हो।' उसे तो
केवल साधनों की ही ज़रूरत होती है ।
मनोवाक्कायतद्वाह्यपदार्थाः साधनानि, तान् ।
तत्वविन्नोपमृद्नाति, व्यवहारोऽस्य नो कुतः ॥९०॥
जब कि तत्व ज्ञानी पुरुष मन, वाणी, काय तथा बाहर
के गृह-क्षेत्र आदि पदार्थों का—जो कि व्यवहार के साध-