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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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२२ पञ्चदशी
युक्ति से कर लेते हैं तब उस समय उनका आत्मा परब्रह्म ही हो
जाता है।
जैसे मूंज में से सींक को युक्ति से बाहर निकाल लेते हैं
इसी प्रकार आत्मा को भी अन्वयव्यतिरेक नामक युक्ति के सहारे
से धीर [ब्रह्मचर्यादिसाधनसम्पन्न अधिकारी] लोग यदि प्रथम
कहे हुए तीनों शरीरों में से पृथक् कर लें तो उनका वह आत्मा
परब्रह्म ही हो जाता है। फिर तो चिदानन्दरूपी लक्षण उन
दोनों में समान ही हो जाता है, फिर उसके ब्रह्म होने में संशय
नहीं रहता।
परापरात्मनोरेवं युक्त्या संभावितैकता ।
तत्त्वमस्यादिवाक्यैः सा भागत्यागेन लक्ष्यते ॥४३॥
इस प्रकार 'पर' और 'अपर' आत्मा की एकता को युक्ति
से अंगीकार किया गया। उसी एकता को 'तत्त्वमसि' आदि
वाक्य भागत्याग लक्षणा से लक्षित कर रहे हैं।
यहां तक पर और अपर आत्मा की [जिनको 'परमात्मा'
और 'जीवात्मा' भी कहा जाता है] एकता की संभावना [लक्षण
की समानता आदि उपायों से ] की गयी है। उसी एकता को
'तत्त्वमसि' आदि महावाक्य भागत्याग लक्षणा [विरोधी भाग
को छोड़कर अविरोधी भाग को लेने वाली लक्षणा ] से स्पष्ट ही
लक्षित कर रहे हैं।
जगतो यदुपादानं मायामादाय तामसीम् ।
निमित्तं शुद्धसत्त्वां तामुच्यते ब्रह्म तद्गिरा ॥४४॥
तमःप्रधान माया को लेकर जो जगत् का उपादान हो जाता
है, तथा जो शुद्धसत्त्वप्रधान माया को लेकर जगत् का निमित्त