Skip to content
SarvaKosh
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 38 of 726

Read in context
Page 38

२० पञ्चदशी
रहना अर्थात् छूट जाना ] कहाता है । [इस प्रकरण में अन्वय-
व्यतिरेक का अभिप्राय अनुवृत्ति और व्यावृत्ति से है ]
लिङ्गाभाने सुषुप्तौ स्यादात्मनो भानमन्वयः ।
व्यतिरेकस्तु तद्भाने लिङ्गस्याभानमुच्यते ॥३९॥
सुषुप्ति अवस्था आजाने पर लिङ्गदेह का तो अभान [ अप्र-
तीति ] हो जाता है और आत्मा का तब भी भान बना रहता है
यों [ सुषुप्ति अवस्था के साक्षी के रूप में ] आत्मा का स्फुरण होते
रहना ही आत्मा का 'अन्वय' [ अर्थात् अनुवृत्त रहना ] कहाता
है । तथा उस समय आत्मा का भान होते रहने पर भी लिङ्गदेह
की प्रतीति न होना, लिंगदेह का 'व्यतिरेक [ अर्थात् अनुवृत्त न
रहना ] कहाता है ।
तद्विवेकविविक्ताः स्युः कोशाः प्राणमनोधियः ।
ते हि तत्र गुणावस्थाभेदमात्रात् पृथक् कृताः ॥४०॥
लिंगदेह का विवेक कर लेने से ही प्राणमय, मनोमय और
विज्ञानमय ये तीनों ही कोश विविक्त हो जाते हैं। क्योंकि वे तो
गुणों की अवस्था की भिन्नता के कारण ही उस लिङ्गदेह से पृथक्
से हो रहे हैं।
लिङ्गदेह का विवेचन इसलिये किया है कि 'प्राणमय' 'मनो
मय' तथा 'विज्ञानमय' कोश इसीमें अन्तर्भूत हो रहे हैं। इस
लिङ्गदेह का विवेक कर लेने पर प्राण, मन तथा विज्ञानमय नाम के
तीनों कोश स्वयमेव विविक्त किंवा आत्मा से पृथक् हो जाते हैं।
क्योंकि वे प्राणमय आदि कोश उस लिंग शरीर में सत्व और रज
नामक गुणों की केवल अवस्था की भिन्नता से [ उनके गुण-
प्रधानभाव के कारण प्राप्त हुई विशेष अवस्था के कारण ही ] भेद