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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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३५० पञ्चदशी
सब से सम्बन्ध वाला होने से ही उसे 'संपूर्ण' कहा जाता है ।
उसी को शिव भी कहते हैं ।
इति शैवपुराणेषु कूटस्थः प्रविवेचितः ।
जीवेशत्वादिरहितः केवलः स्वप्रभः शिवः ॥५९॥
इस प्रकार जीव और ईश्वर आदि की कल्पना से रहित केवल
[अद्वितीय] स्वयंप्रकाश चैतन्यरूप जो शिव नाम का कूटस्थ तत्व
है उसी का विवेचन शैव पुराणों में किया है ।
मायाभासेन जीवेशौ करोतीति श्रुतत्वतः ।
मायिकावेव जीवेशौ स्वच्छौ तौ काचकुम्भवत् ॥६०॥
श्रुति में कहा गया है कि- माया, आभास के द्वारा 'जीव'
और 'ईश्वर' को बना लेती है । अर्थात् ये दोनों मायिक हैं।
मिट्टी का बना होने पर भी काच का घड़ा जैसे और घड़ों से
स्वच्छ होता है इसी प्रकार माया के बने होने पर भी ये दोनों
देहादियों से स्वच्छ होते हैं।
अन्नजन्यं मनो देहात्स्वच्छं यद्वत् तथैव तौ ।
मायिकावपि सर्वस्मादन्यस्मात् स्वच्छतां गतौ ॥६१॥
[देह और मन दोनों ही अन्न से बने हैं-] अन्न से उत्पन्न
होने पर भी मन जैसे देह से स्वच्छ होता है, इसी प्रकार मायिक
होने पर भी ये 'जीव' और 'ईश्वर' और सब मायिक पदार्थों
की अपेक्षा से स्वच्छ हो गये हैं।
चिद्रूपत्वं च संभाव्यं चित्त्वेनैव प्रकाशनात् ।
सर्वकल्पनशक्ताया मायाया दुष्करं न हि ॥६२॥
उन जीवेश्वरों की चिद्रूपता की सम्भावना भी अनुभव के
आधार से ही करलो- वे चिद्रूप से प्रकाशित हुए रहते हैं या