पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextकूटस्थदीपप्रकरणम् ३३९
स्वविषयक अज्ञान को हटा देती हैं। यों अज्ञान की व्याप्ति भी
वृत्तियों में नहीं रहती और 'अज्ञातता' भी नहीं आती । ]
द्विगुणीकृतचैतन्ये जन्मनाशानुभूतितः ।
अकूटस्थं तदन्यत्तु कूटस्थमविकारतः ॥२४॥
सार बात तो यह है कि उस दुगुने चैतन्य में [ उन दो
प्रकार के चेतनों में]जिस चैतन्य के जन्म और नाश होते हुए
प्रतीत होते हों, उसे तो 'अकूटस्थ' मानना चाहिए। अविकारी
होने के कारण उससे भिन्न जो दूसरा चैतन्य है, उसे 'कूटस्थ'
जान लेना चाहियें ।
अन्तःकरणतद्वृत्तिसाक्षीत्यादावनेकधा ।
कूटस्थ एव सर्वत्र पूर्वाचार्यैर्विनिश्चितः ॥२५॥
'अन्तःकरण तद्वृत्तिसाक्षी चैतन्यविग्रहः। आनन्दरूपः सत्यः सन्
किं नात्मानं प्रपद्यसे' इत्यादि श्लोकों में सब जगह पूर्वाचार्यों ने
चिदाभास से भिन्न कूटस्थ का उपपादन किया है। [यह
कूटस्थ हमारा कपोलकल्पित नहीं है ]।
आत्माभासाश्रयाश्चैवं मुखाभासाश्रया यथा ।
गम्यन्ते शास्त्रयुक्तिभ्यामित्याभासश्च वर्णितः ॥२६॥
जैसे (१) मुख (२) मुखाभास तथा (३) उसका आश्रय
अर्थात् दर्पण होता है इसी प्रकार (१) कूटस्थ आत्मा (२)
आभास तथा (३) अन्तःकरण आदि उसका आश्रय होता है।
ये तीनों शास्त्र और युक्ति से जाने जाते हैं। यहाँ जो आभास
का वर्णन है उसका अभिप्राय कूटस्थ से भिन्न चिदाभास से
ही है ['मनसः साक्षी बुद्धेः साक्षी' यह शास्त्र तो बुद्धि के साक्षी
कूटस्थ का प्रतिपादन करने वाला है। 'रूपंरूपं प्रतिरूपो बभूव' (कठ