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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 355

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३३५

में चिदाभास रूपी फल का उदय हो जाना ही घट का जान
लिया जाना है ।
परागर्थप्रमेयेषु या फलत्वेन सम्मता ।
संवित् सैवेह मेयोऽर्थो वेदान्तोक्तिप्रमाणतः ॥११॥
परागर्थ जो घटादि वाह्य पदार्थ हैं, वे जब प्रमेय अर्थात्
प्रमाण के विषय होते हैं, उस समय प्रकट होने वाली जो
संवित् (ज्ञान) प्रमाणों का फल मानली गयी है, वही
संवित् इस वेदान्तशास्त्र में वेदान्त वाक्य रूपी प्रमाणों से
जानने योग्य एक पदार्थ है ।
इति वार्तिककारेण चित्साहृश्यं विवक्षितम् ।
ब्रह्मचित्फलयोर्भेदः साहश्यां विश्रुतो यतः ॥१२॥
ऊपर कहे हुए श्लोक में वार्तिककार सुरेश्वराचार्य ने
चित्साहश्य की विवक्षा की है—अर्थात् ब्रह्म चैतन्य के सदृश
चिदाभास को प्रमाणों का फल कहा है । ब्रह्मचैतन्य को फल
नहीं कहा । वार्तिककार के गुरु श्रीमच्छंकराचार्य ने भी उपदेश-
साहसी में ब्रह्मचैतन्य तथा ब्रह्मचैतन्य के फल [चिदाभास]
को भिन्न भिन्न बताया है ।
आभास उदित स्तस्माज्ज्ञातत्वं जनयेद् घटे ।
तत् पुनर्ब्रह्मणा भास्य मज्ञातत्ववदेव हि ॥१३॥
प्रकृत बात तो यही हुई कि-क्योंकि ब्रह्मचित् तथा चिदा-
भासका भेद सिद्ध होचुका, इसलिये घट में जो आभास उदित
होता है, वह घट में ज्ञातता को उत्पन्न किया करता है । वह
ज्ञातता, अज्ञातता की तरह, ब्रह्म से ही भास्य होती है, यह तो
प्रसिद्ध ही है ।