पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextकूटस्थदीपप्रकरणम् ३३३
वही 'अज्ञान' कहाता है । जब कोई कुम्भ इस ज्ञान से
व्याप्त होता है तब उसे 'ज्ञात कुम्भ' कहते हैं। जब कोई कुम्भ
अज्ञान से व्याप्त हुआ रहता है तब उसको 'अज्ञात कुम्भ'
कहा जाता है ।
अज्ञातो ब्रह्मणा भास्यो ज्ञातः कुम्भ स्तथा न किम् ।
ज्ञातत्वजननेनैव चिदाभासपरिक्षयः ॥७॥
जैसे अज्ञात कुम्भ ब्रह्म से भास्य होता है, क्या ऐसे ही
ज्ञात कुम्भ ब्रह्म से भास्य नहीं होसकता ? [किन्तु हो ही
सकता है। अज्ञातता को उत्पन्न करके जैसे अज्ञान उपक्षीण हो
जाता है इसी प्रकार] चिदाभास [ ज्ञान ] भी ज्ञातता को
उत्पन्न करके क्षीण होजाता है, [उसके बाद उसका कोई
उपयोग नहीं रहता, फिरतो अज्ञात कुम्भ की तरह ज्ञात कुम्भ
भी ब्रह्म से ही भास्य होता है]
आभासहीनया बुद्ध्या ज्ञातत्वं नैव जन्यते ।
तादृग्बुद्धेर्विशेषः को मृदादेः स्याद् विकारिणः ॥८॥
जो बुद्धि आभास से हीन है, उससे तो ज्ञातता उत्पन्न
ही नहीं होती। वैसी बुद्धि में और मिट्टी पत्थर में तो कोई
भेद ही नहीं होता । [इसलिये चिदाभास को निरर्थक मत
समझो । अकेली बुद्धि के बस का यह काम नहीं है कि
वह ज्ञातता को उत्पन्न कर सके ।]
ज्ञात इत्युच्यते कुम्भो मृदा लिप्तो न कुत्रचित् ।
धीमात्रव्याप्तकुम्भस्य ज्ञातत्वं नेष्यते तथा ॥९॥
लोक में भी देखलो कि—जो घड़ा मट्टी से ढकरहा हो
उसे कोई भी ज्ञात कुम्भ नहीं कहता। ईसी प्रकार जो कुम्भ