Skip to content
SarvaKosh
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 342 of 726

Read in context
Page 342

३२२ पञ्चदशी
प्रवृत्तिर्नोपयुक्ता चेन्निवृत्तिः कोपयुज्यते ।
बोधहेतु र्निवृत्तिश्चेद् बुभुत्सायां तथेतरा ॥२७६॥
यदि कहा जाय कि ज्ञानी लोग प्रयोजन रहित होने से
कर्मों में प्रवृत्ति नहीं करते । परन्तु हम पूछेंगे कि निवृत्ति का
भी तो ज्ञानी को कुछ उपयोग नहीं है। फिर ज्ञानी लोग निवृत्ति
भी क्यों करते हैं ? यदि कहा जाय कि निवृत्ति तो बोध का
कारण होती है, इससे ज्ञानी लोग निवृत्ति को स्वीकार कर लेते
हैं, तो हम कहेंगे कि ऐसे तो प्रवृत्ति भी ज्ञान की इच्छा में
उपयोगी होती ही है । [हम अनादि काल से प्रवृत्ति में ही हैं।
जब कभी किसी जन्म में हमारे मन में यह प्रश्न उठ खड़ा
होता है कि—इस प्रवृत्ति से हमें क्या मिला ? क्या मिल रहा
है ? और क्या कुछ मिलेगा ? इस प्रश्न का जब कोई सद्दु-
त्तर हमें नहीं मिल पाता, तब हम प्रवृत्ति से हट जाते हैं—
किनारा करने लगते हैं, और तब तत्त्व की जिज्ञासा हमें हो
जाती है । यों प्रवृत्ति भी वैराग्य दिलाकर ज्ञान की इच्छा में
उपयोगी होती ही है ]।
बुद्धश्चेन्न बुभुत्सेत नाप्यसौ बुध्यते पुनः ।
अबाधादनुवर्तेत बोधो न त्वन्यसाधनात् ॥२७७॥
यदि कहा जाय कि जो ज्ञानी है उसे तो बुभुत्सा [ज्ञानेच्छा]
ही नहीं हो सकती, [फिर वह ज्ञानी प्रवृत्ति में क्यों फँसेगा ?]
तो हम कहेंगे कि उस ज्ञानी को दोबारा बोध भी तो नहीं होता
है, इस कारण ज्ञानी के लिये निवृत्ति का भी तो कुछ उप-
योग नहीं रहता है । [महावाक्यों को सुनकर जो बोध उत्पन्न
होता है उस ] बोध की बाधा किसी भी प्रमाण से न हो तो