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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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३१० पञ्चदशी
नियम से करने योग्य काम] नहीं है, जो साधकों को परवश
करना पड़ता हो। किन्तु यह तो वस्तुस्थिति ही है कि तत्वज्ञान
से भ्रान्तिज्ञान भाग जाता है।
तत्वज्ञान का अभ्यास करते करते साधक ने जिन विपरीत
भावनाओं को मार भगाया है, वे कभी कभी इस देहादि समु-
दाय पर, फिर अधिकार पाने का उद्योग करेंगी ही। वे यदि
कभी कभी लौट कर आ जाती हैं तो आया करें। उनको फिर
फिर मार भगाना चाहिये। इन भावनाओं को भगाने में कुछ
समय भी लगता होता है और प्राणियों के स्वभावानुसार
इसका भिन्न-भिन्न क्रम भी होता है।
दशमोऽपि शिरस्ताडं रुदन् बुद्ध्वा न रोदिति ।
शिरोव्रणस्तु मासेन शनैः शाम्यति नो तदा ॥२४७॥
जो दसवां अब तक सिर पीट पीट कर रो रहा था, वही
दसवां, ज्ञान हो जाने पर रोना तो तुरन्त रोक देता है, परन्तु
सिर पीटने से उसके सिर में जो घाव हो गया था, वह तो
कहीं महीनों में जाकर अच्छा हो पाता है। वह तुरन्त अच्छा
नहीं होता ।
दशमामृतिलाभेन जातो हर्षो व्रणव्यथाम् ।
तिborder धत्ते, मुक्तिलाभस्तथा प्रारब्धदुःखिताम् ॥२४८॥
दसवें के न मरने के लाभ को सुनकर जो हर्ष होता है
वह हर्ष घाव की पीडा को भुला देता है। ठीक इसी प्रकार
जीवन्मुक्ति भी प्रारब्धदुःखों को ढक लेती है [ जीवन्मुक्ति
मिलने पर जो हर्ष होता है, उसके सामने, प्रारब्धदुःखों की
कुछ गिनती ही नहीं रह जाती। ऐसी अवस्था में ज्ञान हो जाने