पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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सुख दुःखों को देखकर अज्ञानियों की तरह उन्हें कोई क्लेश
नहीं होता ]
अतिप्रसङ्गो मा शंक्यः स्वकर्मवशवर्तिनाम् ।
अस्तु वा केन शक्येत कर्म वारयितुं वद ॥१३२॥
ऐसे तो फिर ज्ञानी लोग अनाचार भी करेंगे, ऐसी शंका
न करनी चाहिए। या फिर अपने अपने प्रारब्ध कर्म के बस
में आकर अनाचार कर भी बैठे तो बताओ प्रारब्ध कर्म को
वारण कर देने का सामर्थ्य ही किसमें है ? [ प्रारब्ध तो ईश्वर
का संकल्प है वह हमारे संकल्पों से प्रबल होता है उसका
वारण कोई भी नहीं कर सकता । ]
ज्ञानिनोऽज्ञानिनश्चात्र समे प्रारब्धकर्मणी ।
न क्लेशो ज्ञानिनो धैर्यान्मूढः क्लिश्यत्यधैर्यतः ॥१३३॥
ज्ञानी और अज्ञानी दोनों ही के प्रारब्ध कर्म समान होते
हैं। उनमें भेद केवल इतना ही है कि धैर्य के कारण ज्ञानो को
तो क्लेश नहीं होता। परन्तु अधीरता के कारण मूढ पुरुष दुःखी
हुआ है। [ इसी विषय पर एक भाषा कवि ने कहा
है—देह धरे का दण्ड है सब काहू को होय। ज्ञानी भुगते ज्ञान
सों मूरख भुगते रोय । ]
मार्गे गन्त्रोर्द्वयोः श्रान्तौ समायामप्यदूरताम् ।
जानन् धैर्याद् द्रुतं गच्छेद॒न्यस्तिष्ठति दीनधीः ॥१३४॥
मार्ग में जाने वाले दो यात्री जब थक जाते हैं और दोनों
की यात्रा समाप्त होने को होती है, उन दोनों यात्रियों में से,
यात्रा की समाप्ति को जानने वाला एक तो, धीरता के कारण
शीघ्र शीघ्र चलता ही जाता है। दूसरा तो