पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context१६८ पञ्चदशी
तुरन्त ही आत्मतत्व का स्मरण कर लेता है उसे विपरीत ज्ञान
होने का तो कोई अवसर ही नहीं मिलता ।
तत्त्वस्मृतेरवसरो नास्त्यन्याभ्यासशालिनः ।
प्रत्युताभ्यासघातित्वाद् बलात् तत्त्वमुपेक्ष्यते ॥१२७॥
जो पुरुष अनात्मपदार्थों का अभ्यास किया करता है,
उसको तो तत्त्वस्मरण का अवकाश [ मौक़ा=फुर्सत ] ही नहीं
मिलता । इतना ही नहीं प्रत्युत ऐसे अभ्यास ब्रह्माभ्यास के
विघातक होते हैं । उस समय तो स्मरण किया हुआ तत्व भी
बलात् भूल जाता है ।
तमेवैकं विजानीथ ह्यन्या वाचो विमुञ्चथ ।
इति श्रुतं तथान्यत्र वाचो विग्लापनं त्विति ॥१२८॥
तत्त्वस्मरण के विरोधी काव्यतर्कादि के अनुशीलन को
छोड़ने की बात 'तमेवैकं विजानीथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथ
अमृतस्यैष सेतुः' (मुण्ड२५-२) इस श्रुति में तथा (नानुध्यायाद्बहूञ्शब्दा
न्वाचो विग्लापनं हि तत्) (बृह० ४-४-२१) इस श्रुति में कही
गयी है ।
आहारादि त्यजन्नैव जीवेच्छास्त्रान्तरं त्यजन् ।
किं न जीवसि, येनैवं करोष्यत्र दुराग्रहम् ॥१२९॥
भोजनादि का त्याग करके तो कोई जीवित नहीं रह
सकता । क्या तुम उसी तरह दूसरे अनात्मशास्त्रों का त्याग
करके जीवित नहीं रह सकते हो ? जिससे ऐसा दुराग्रह किये
जा रहे हो ।
जनकादेः कथं राज्यमिति चेद् दृढबोधतः ।
तथा तवापि चेत् तर्कं पठ यद्वा कृषिं कुरु ॥१३०॥