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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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न अज्ञानिता ही रह सकती है [क्योंकि उसे तो अज्ञान की
निवृत्ति की कुछ आवश्यकता ही नहीं होतो। इसलिये कूटस्थ तो
यह जानता ही नहीं कि मैं कूटस्थ हूँ ] फिर तुम्हें यह बताना
चाहिये कि—आभास को यह ज्ञान कैसे हो सकता है कि 'मैं
कूटस्थ हूँ' ?
नायं दोषश्चिदाभासः कूटस्थैकस्वभाववान् ।
आभासत्वस्य मिथ्यात्वात् कूटस्थत्वावशेषणात् ॥१५॥
यह दोष ठीक नहीं,चिदाभास का असली स्वरूप तो कूटस्थ
ही है। वह चिदाभास कूटस्थ से भिन्न तो सिद्ध हो ही नहीं
सकता। क्योंकि आभासत्व तो मिथ्या ही है [ज्ञान के द्वारा]
उसकी कूटस्थता को शेष रख लिया जाता है [जैसे कि दर्पण
में प्रतीत होने वाले मुखाभास का असली स्वरूप तो गरदन पर
लगा हुआ मुख ही है। इसी प्रकार इसे भी जान लो।]
कूटस्थोऽस्मीति बोधोऽपि मिथ्या चेन्नेति को वदेत्।
न हि सत्यतयाऽभीष्टं रज्जुसर्पविसर्पणम् ॥१६॥
यदि चिदाभास मिथ्या है तो उसके आश्रित रहनेवाला
'मैं कूटस्थ हूँ' यह ज्ञान भी तो मिथ्या ही होना चाहिये ? ऐसा
यदि पूछा जाय तो हम कहेंगे कि फिर इस बात का निषेध
हम कब करते हैं ? [कूटस्थ के स्वरूप के अतिरिक्त और जो
भी कुछ है वह सभी मिथ्या है। फिर इस ज्ञान को मिथ्या
मानना भी तो हमें इष्ट ही. है] देखो, रज्जु में जो सर्प कल्पित
कर लिया गया है,वह जब नष्ट होता हुआ प्रतीत हो तब उस
[विसर्पण] को कोई वास्तविक विसर्पण नहीं मानता है।