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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

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DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 236

२१६ पञ्चदशी
भरतादि ने भी काष्ठ या पाषाण की तरह खान पान
आदि का परित्याग तो कभी भी नहीं किया था। किन्तु वे
लोग संगदोष के लग जाने के डर से; उदासीन रहते थे ।
[पुराणों का तात्पर्य भी उनकी उदासीनता के दिखाने में ही है ]
सङ्गी हि बध्यते लोके निःसङ्गः सुखमश्नुते ।
तेन सङ्गः परित्याज्यः सर्वदा सुखमिच्छता ॥२७४॥
लोक में देखते हैं कि सङ्ग करने वाले लोग ही बँधे फिरते
हैं। निःसंग लोगों को मौज मारते हुए पाया जाता है । इससे
जो लोग नित्य सुख की इच्छा रखते हों, उन्हें संग का परि-
त्याग सदा के लिये कर देना चाहिये ।
अज्ञात्वा शास्त्रहृदयं मूढो वक्त्यन्यथान्यथा ।
मूर्खाणां निर्णय स्त्वास्तामस्मत्सिद्धान्त उच्यते॥२७५॥
मूर्ख लोग शास्त्र के मर्म को तो पहचानते नहीं और कुछ
का कुछ कहने लगते हैं। इस कारण उनकी बात को यहीं
छोड़ कर अब हम अपनी प्रकृत बात, किंवा शास्त्र के रहस्य
का वर्णन करते हैं ।
वैराग्यबोधोपरमाः सहायास्ते परस्परम् ।
प्रायेण सह वर्तन्ते वियुज्यन्ते क्वचित् क्वचित् ॥२७६॥
शास्त्र का सिद्धान्त तो यह है कि—'वैराग्य' 'बोध' तथा
'उपरम' ये तीनों परस्पर के सहायक हैं। ये तीनों प्रायः करके
साथ ही साथ रहते हैं। कहीं कहीं तो ये अलग अलग भी
पाये जाते हैं। . .
हेतुस्वरूपकार्याणि भिन्नान्येषामसङ्करः ।
यथावदवगन्तव्यः शास्त्रार्थं प्रविविच्यता ॥२७७॥