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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 208 of 726

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Page 208

१९० पञ्चदशी

सस्यं वा शाकजातं वा सर्वतोऽङ्कुरितं यथा ।
कोमलं तद्वदेवैष पेलवो जगदङ्कुरः ॥२०३॥
अथवा दूसरे दृष्टान्त से इसी बात को यों समझो कि—
जैसे अन्न के पेड़ या शाक के पौधे चारों ओर से बहुतायत से
अंकुर फूटते समय कोमल हो जाते हैं, इसी प्रकार यह [हिरण्य-
गर्भ नाम का ] जगदङ्कुर भी [ सृष्टिनिर्माण के लिये ] नरम हो
जाता है ।
आतपाभातलोको वा पटो वा वर्णपूरितः ।
सस्यं वा फलितं यद्वत् तथा स्पष्टवपुर्विराट् ॥२०४॥
पंचीकृत भूतों या उनके कार्यों की उपाधि वाले विराट् का
शरीर तो इतना विशद हो जाता है, मानो धूप से प्रकाशित होने
वाला जगत् ही हो, अथवा रंगभरा हुआ कोई कपड़ा ही हो,
अथवा किसी सस्य पर फलों के गुच्छे लटक आये हों ।
विश्वरूपाध्याय एष उक्तः सूक्तेऽपि पौरुषे ।
धात्रादिस्तम्बपर्यन्तानेतस्यावयवान् विदुः ॥२०५॥
विश्वरूपाध्याय के पुरुषसूक्त में जो वर्णन है वह इसी
'विराट्' का है । ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त जगत् को इसी
वराट् का अवयव बताया जाता है ।
ईशसूत्रविराड्वेधोविष्णुरुद्रेन्द्रवह्नयः ।
विघ्नभैरवमैरालमरिकायक्षराक्षसाः ॥२०६॥
विप्रक्षत्रियविट्शूद्रा गवाश्वमृगपक्षिणः ।
अश्वत्थवटचूताद्या यवव्रीहितृणादयः ॥२०७॥
जलपाषाणमृत्काष्ठवास्यकुद्दालकादयः ।
ईश्वराः सर्व एवैते पूजिताः फलदायिनः ॥२०८॥