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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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चित्रदीपप्रकरणम् १८५
वही ईश्वर अपने जाड्यांश से तो अचेतनों का उपादान
है, तथा वही अपने चिदाभासांश से जीवों का कारण हो
जाता है ।
तमःप्रधानः क्षेत्राणां चित्प्रधानश्चिदात्मनाम् ।
परः कारणतामेति भावनाज्ञानकर्मभिः ॥१८८॥
इति वार्तिककारेण जडचेतनहेतुता ।
परमात्मन एवोक्ता नेश्वरस्येति चेच्छृणु ॥१८९॥
भावना [संस्कार] ज्ञान तथा [पुण्यापुण्यरूपी] कर्मों
के निमित्त से, वह परमात्मा जब जब तमःप्रधान होता है तब
तब तो क्षेत्र अर्थात् शरीरादि का कारण हो जाता है तथा जब
जब चित्प्रधान होता है तब तब चिदात्माओं का कारण बन
जाता है । इस प्रकार वार्तिककार सुरेश्वराचार्य ने तो जड और
चेतन का हेतु परमात्मा को ही बताया है, ईश्वर को नहीं,
तो इस का उत्तर भी सुन लो ।
अन्योन्याध्यासमत्रापि जीवकूटस्थयोरिव ।
ईश्वरब्रह्मणोः सिद्धं कृत्वा ब्रूते सुरेश्वरः ॥१९०॥
त्वंपद् के अर्थ जीव और कूटस्थ में जैसे अन्योन्याध्यास
होता है इसी प्रकार तत्पद के अर्थ जो ईश्वर और ब्रह्म हैं
उनमें भी अन्योन्याध्यास की विवक्षा करके ही सुरेश्वराचार्य
ने परमात्मा को जड और चेतन का हेतु कह दिया है [नहीं
तो उनको जड और चेतन का कारण ईश्वर को ही कहना
चाहिये था ।]
सत्यं ज्ञानमनन्तं यद् ब्रह्म तस्मात् समुत्थिताः ।
खं वाय्वग्निजलोर्व्योषध्यन्नदेहा इति श्रुतिः ॥१९१॥
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