Skip to content
SarvaKosh
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished726 pages

Page 192 of 726

Read in context
Page 192

१७४ पञ्चदशी
साभासमेव तद् बीजं धीरूपेण प्ररोहति ।
अतो बुद्धौ चिदाभासो विस्पष्टं प्रतिभासते ॥१५४॥
चिदाभास से युक्त वह बीज [ अज्ञान ] ही बुद्धिरूप से
परिणत हो जाता है इस कारण तब तो वह चिदाभास बुद्धि में स्पष्ट
ही प्रतीत होने लगता है । [ तात्पर्य यह कि चिदाभासयुक्त
वह अज्ञान, जब बुद्धिरूप को धारण कर लेता है तब तो उसमें
स्पष्ट ही चिदाभास दीखने लगता है,परन्तु बुद्धि की वासनाओं
में चिदाभास प्रतीत नहीं होता है । ]
मायाभासेन जीवेशौ करोतीति श्रुतौ श्रुतम् ।
मेघाकाशजलाकाशाविव तौ सुव्यवस्थितौ ॥१५५॥
वह माया आभास के द्वारा जीव और ईश्वर को बना देती
है यह श्रुति में कहा गया है । वे जीव और ईश्वर, मेघाकाश
तथा जलाकाश के समान पृथक् पृथक् व्यवस्थित हो जाते हैं
[ ऐसी अवस्था में यद्यपि जीव और ईश्वर दोनों मायिक हैं,
परन्तु अस्पष्ट और स्पष्ट उपाधि वाला होने से, क्रम से मेघाकाश
और जलाकाश के समान, इन दोनों का अवान्तर भेद सिद्ध हो
जाता है । ]
मेघवद् वर्तते माया मेघस्थिततुषारवत् ।
धीवासनाश्चिदाभासस्तुषारस्थखवत् स्थितः ॥१५६॥
माया तो मेघ के समान है । मेघ में जो तुषार होते हैं बुद्धि-
वासनायें उनके समान होती हैं । उन तुषारों में जो आकाश
होता है उसके समान वह चिदाभास है ।
मायाधीनश्चिदाभासः श्रुतो मायी महेश्वरः ।
अन्तर्यामी च सर्वज्ञो जगद्योनिः स एव हि ॥१५७॥