पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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अज्ञानी विदुषा पृष्टः कूटस्थं न प्रबुध्यते ।
न भाति नास्ति कूटस्थ इति बुद्ध्वा वदत्यपि ॥२७॥
अज्ञानी से जब विद्वान् पूछता है तो वह कूटस्थ को नहीं
जानता [यही उसका अविद्या का अनुभव हुआ] मुझे कूटस्थ
न तो प्रतीत ही होता है और न वह है ही, यों आवरण को
अनुभव करके उसका वर्णन भी वह करता ही है।
अविद्या तथा उसके आवरण का प्रमाण जानना हो तो
लोकानुभव को ही प्रमाण मानना चाहिये यही बात इस श्लोक
में कही है—जब कोई विद्वान् किसी अज्ञानी से यह पूछता है
कि 'क्या तू कूटस्थ को जानता है?' वह अज्ञानी उस कूटस्थ
को नहीं जानता—अर्थात् उसे कूटस्थ का अज्ञान रहता है। इस
अज्ञान किंवा अविद्या को अनुभव करके ही वह चुप नहीं हो
जाता। वह यह भी कह देता है कि—तुम्हारा बूझा हुआ वह
कूटस्थ न तो मुझे प्रतीत ही होता है और न वह है ही। यों इस
रूप में उस आवरण का भी अनुभव होता है। यों अविद्या और
आवरण दोनों में अनुभव को ही प्रमाण मानना चाहिये।
स्वप्रकाशे कुतोऽविद्या तां विना कथमावृतिः ।
इत्यादितर्कजालानि स्वानुभूतिर्ग्रसत्यसौ ॥२८॥
स्वप्रकाश पदार्थ में अविद्या कहाँ से आयी ? तथा अविद्या
के बिना आवरण कैसे हुआ ? इत्यादि तर्कों को तो स्वानुभव
ही ग्रस लेता है।
आप आत्मा को स्वयंप्रकाश मानते हो। इसी से उसमें
अविद्या का होना ठीक नहीं है। प्रकाश और अन्धकार के
समान विरुद्ध स्वभाव वाले होने से इन दोनों का परस्पर