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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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Page 142

ओम्
चित्रदीपप्रकरणम्
यथा चित्रपटे दृष्टमवस्थानां चतुष्टयम् ।
परमात्मनि विज्ञेयं तथावस्थाचतुष्टयम् ॥१॥
चित्रयुक्त पट में जैसे [आगे कही हुई] चार अवस्थायें
देखी जाती हैं, इसी प्रकार परमात्मा की भी [आगे कही] चार
अवस्थायें जाननी चाहियें ।
'अध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपंचं प्रपञ्च्यते' क्योंकि आत्मतत्व
निष्प्रपंच है, इस कारण उसका सीधा निरूपण तो हो ही नहीं
सकता, परन्तु अध्यारोप तथा अपवाद नाम के दो ऐसे सहारे
अध्यात्मशास्त्र ने ढूँढ निकाले हैं कि उन से उसका वर्णन शक्य
हो गया है । इस न्याय के अनुसार जो जगत् परमात्मा में
आरोपित हो रहा है, उसकी स्थिति कैसी है, इस का स्पष्टी-
करण इस प्रकरण में किया गया है । इस निरूपण से यह
होगा कि इस आरोपित जगत् का निषेध करने में बड़ी सुकरता
हो जायगी ।
यथा धौतो घट्टितश्च लाञ्छितो रञ्जितः पटः ।
चिदन्तर्यामी सूत्रात्मा विराड् चात्मा तथेर्यते ॥२॥