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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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[Page Header: द्वैतविवेकप्रकरणम् ९३]

जाती है त्यों त्यों संकल्प का बल घटने लगता है और
अगत्या कर्म बल से कार्य चलाना पड़ता है। परमेश्वर में वह
संकल्प बल अत्यधिक मात्रा में रहता है इस कारण वे विचार-
मात्र से सब कुछ बना लेते हैं।
इदमग्रे सदेवासीद् बहुत्याय तदैक्षत ।
तेजोऽबन्नाण्डजादीनि ससर्जेति च सामगाः॥६॥
'सदेव सोम्येदमग्र आसी देकमेवाद्वितीयम्' (छा० ६–२–१)
में सद्रूप ब्रह्म का उल्लेख करके सामगों ने कहा है कि उसने
बहुभाव का विचार किया और फिर तेज, जल, पृथिवी, अन्न
तथा अण्डजादि प्राणियों को उत्पन्न करडाला।
विस्फुलिङ्गा यथा वन्हे र्जायन्तेऽक्षरतस्तथा ।
विविधाश्चिज्जडा भावा इत्याथर्वणिका श्रुतिः ॥७॥
'तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते
सरूपाः तथाऽक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति'
(मुण्ड० २–१–१) इस आथर्वण श्रुति में कहा गया है कि
जैसे वह्नि से चिनगारी निकल पड़ती है, इसी प्रकार अक्षर
तत्व से विविध प्रकार के चेतन और जड पदार्थ उत्पन्न हो
जाते हैं।
जगदव्याकृतं पूर्व मासीद् व्याक्रियताधुना ।
दृश्याभ्यां नामरूपाभ्यां विराडादिषु ते स्फुटे ॥८॥
विराणमनुर्नरा गावः खराश्वाजावयस्तथा ।
पिपीलिकावधि द्वन्द्वमिति वाजसनेयिनः ॥९॥
'तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतासौनामा-