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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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८८ पञ्चदशी
'ईश्वर' वा 'जीव' कहा जाता है, वह आगे कही दो उपाधियों
से कल्पित किया हुआ होता है [ कल्पित होने से ही ये जीवे-
श्वर भी उस ब्रह्म के परिच्छेदक नहीं बन सकते हैं ]
शक्तिरस्त्यैश्वरी काचित् सर्ववस्तुनियामिका ।
आनन्दमयमारभ्य गूढा सर्वेषु वस्तुषु ॥३८॥
ऐश्वरी अर्थात् ईश्वर से सम्बन्ध रखने वाली [ ईश्वर की
उपाधि बनी हुई] कोई एक ऐसी शक्ति है [जिसका सत् या असत्
किसी भी रूप से निर्वचन नहीं हो सकता] जो [पृथिवी आदि]
सम्पूर्ण नियम्य वस्तुओं को नियम में रख रही है। वह शक्ति
आनन्दमय से लेकर [ब्रह्माण्ड पर्यन्त] सभी वस्तुओं में गूढ भाव
से छिपी बैठी है [यही कारण है कि वह दीख नहीं पड़ रही है]।
वस्तुधर्मा नियम्येरन् शक्त्या नैव यदा तदा ।
अन्योऽन्यधर्मसांकर्याद् विप्लवेत जगत् खलु ॥३९॥
यदि यह शक्ति, पृथिवी आदि वस्तुओं के [काठिन्य द्रवत्व
आदि ] धर्मों को नियम में न रखती होती तो अन्योऽन्य धर्म
की संकरता किंवा मिश्रण हो जाने से [ किसी एक जगह
नियत भाव से न रहने से ] जगत् में विप्लव मच जाता ।
चिच्छायावेशतः शक्तिश्चेतनेव विभाति सा।
तच्छक्त्युपाधिसंयोगाद् ब्रह्मैवेश्वरतां व्रजेत् ॥४०॥
चिच्छायावेश [ किंवा चिदाभासके प्रवेश ] से यह शक्ति
चेतन सी प्रतीत हुआ करती है [ इसी से वह नियामक हो
सकती है ] उस शक्ति रूपी उपाधि के सम्बन्ध से [ सत्यादि
रूप ] ब्रह्म ही ईश्वरभाव को प्राप्त हो जाता है [किंवा सर्वज्ञत्व
आदि धर्मों से युक्त हो जाता है ]।