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पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,018 pages

Page 920 of 1018

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Page 920

उत्तरखण्ड ] * मृगशृङ्गका विवाह, विवाहके भेद तथा गृहस्थ-आश्रमका धर्म * ९०३
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तथा मुनीश्वर मृगशृङ्गने भी पहले जिसे मन-ही-मन वरण किया था, उस उचथ्य-पुत्री सुवृत्ताके साथ विवाह करनेकी इच्छा की। इसके बाद उन्होंने महर्षि वेदव्यासजीकी आज्ञासे सुवृत्ता तथा उसकी तीनों सखियों—कमला, विमला और सुरसाका पाणिग्रहण किया।

श्रुति कहती है—'ब्राह्मणोंके लिये ब्राह्म विवाह सबसे उत्तम है।' इसलिये मुनिने उन चारों कन्याओंको ब्राह्म विवाहकी ही रीतिसे ग्रहण किया। इस प्रकार विवाह हो जानेपर मुनिवर वत्सने समस्त ऋषियोंको मस्तक झुकाया तथा वे मुनीश्वर भी वर-वधूको आशीर्वाद दे उनसे पूछकर अपनी-अपनी कुटीमें चले गये।

राजा दिलीपने पूछा—गुरुदेव वसिष्ठजी! चारों वर्णोंके विवाह कितने प्रकारके माने गये हैं? यह बात यदि गोपनीय न हो तो मुझे भी बताइये।

वसिष्ठजी बोले—राजन्! सुनो, मैं क्रमशः तुमसे सभी विवाहोंका वर्णन करता हूँ। विवाह आठ प्रकारके हैं—ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच। जहाँ वरको बुलाकर वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित कन्याका [विधिपूर्वक] दान किया जाता है, वह ब्राह्म विवाह कहलाता है। ऐसे विवाहसे उत्पन्न होनेवाला पुत्र इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करता है। यज्ञ करनेके लिये ऋत्विजको जो कन्या दी जाती है, वह दैव विवाह है। उससे उत्पन्न होनेवाला पुत्र चौदह पीढ़ियोंका उद्धार करता है। वरसे दो बैल लेकर जो कन्याका दान किया जाता है, वह आर्ष विवाह है। उससे उत्पन्न हुआ पुत्र छः पीढ़ियोंका उद्धार करता है। 'दोनों एक साथ रहकर धर्मका आचरण करें' यों कहकर जो किसी माँगनेवाले पुरुषको कन्या दी जाती है, वह प्राजापत्य विवाह कहलाता है। उससे उत्पन्न हुआ पुत्र भी छः पीढ़ियोंका उद्धार करता है। ये चार विवाह ब्राह्मणोंके लिये धर्मानुकूल माने गये हैं। जहाँ धनसे कन्याको खरीदकर विवाह किया जाता है, वह आसुर विवाह है। वर और कन्यामें परस्पर मैत्रीके कारण जो विवाह-सम्बन्ध स्थापित होता है, उसका नाम गान्धर्व है। बलपूर्वक कन्याको हर लाना राक्षस विवाह है। सत्पुरुषोंने इसकी निन्दा की है। छलपूर्वक कन्याका अपहरण करके किये जानेवाले विवाहको पैशाच कहते हैं। यह बहुत ही घृणित है। समान वर्णकी कन्याओंके साथ विवाहकालमें उनका हाथ अपने हाथमें लेना चाहिये, यही विधि है। धर्मानुकूल विवाहोंसे सौ वर्षतक जीवित रहनेवाली धार्मिक सन्तान उत्पन्न होती है तथा अधर्ममय विवाहोंसे जिनकी उत्पत्ति होती है, वे भाग्यहीन, निर्धन और थोड़ी आयुवाले होते हैं; अतः ब्राह्मणोंके लिये ब्राह्म विवाह ही श्रेष्ठ है।

इस प्रकार मुनीश्वर मृगशृङ्ग विधिपूर्वक विवाह करके वेदोक्त मार्गसे भलीभाँति गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करने लगे। उनकी गृहस्थीके समान दूसरे किसीकी गृहस्थी न कभी हुई है, न होगी। सुवृत्ता, कमला, विमला और सुरसा—ये चारों पत्नियाँ पातिव्रत्य धर्ममें तत्पर हो सदा पतिकी सेवामें लगी रहती थीं। उनके सतीत्वकी कहीं तुलना नहीं थी। इस प्रकार वे धर्मात्मा मुनि उन धर्मपत्नियोंके साथ रहकर भलीभाँति धर्मका अनुष्ठान करने लगे।

राजा दिलीपने पूछा—मुनिवर! पतिव्रताका क्या लक्षण है? तथा गृहस्थ-आश्रमका भी क्या लक्षण है? मैं इस बातको जानना चाहता हूँ। कृपया बताइये।

वसिष्ठजी बोले—राजन्! सुनो, मैं गृहस्थाश्रमका लक्षण बतलाता हूँ। सदाचारका पालन करनेवाला पुरुष दोनों लोक जीत लेता है। ब्राह्म मुहूर्तमें शयनसे उठकर पहले धर्म और अर्थका चिन्तन करे। फिर अर्थोपार्जनमें होनेवाले शारीरिक क्लेशपर विचार करके मन-ही-मन परमेश्वरका स्मरण करे। धनुषसे छूटनेपर एक बाण जितनी दूरतक जाता है, उतनी दूरकी भूमि लाँघकर घरसे दूर नैर्ऋत्य कोणकी ओर जाय और वहाँ मल-मूत्रका त्याग करे। दिनको और सन्ध्याके समय कानपर जनेऊ चढ़ाकर उत्तरकी ओर मुँह करके शौचके लिये बैठना चाहिये और रात्रिमें दक्षिण दिशाकी ओर मुँह करके मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये। मलत्यागके समय भूमिको तिनकेसे ढँक दे और अपने