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पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,018 pages

Page 875 of 1018

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Page 875

८५८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


अङ्गको दुःख भोगना पड़ा था; इसलिये अब तुम कुटुम्बकी आशा छोड़ दो। त्यागमें ही सब प्रकारका सुख है।

ब्राह्मण बोले— बाबा ! विवेकसे क्या होगा ? मुझे तो जैसे बने वैसे पुत्र ही दीजिये; नहीं तो मैं शोकसे मूर्च्छित होकर आपके आगे ही प्राण त्याग दूँगा। पुत्र सुखसे हीन यह संन्यास तो सर्वथा नीरस ही है। संसारमें पुत्र-पौत्रोंसे भरा हुआ गृहस्थाश्रम ही सरस है।

ब्राह्मणका यह आग्रह देख उन तपोधनने कहा— 'देखो, विधाताके लेखको मिटानेका हठ करनेसे राजा चित्रकेतुको कष्ट भोगना पड़ा; अतः दैवने जिसके पुरुषार्थको कुचल दिया हो, ऐसे पुरुषके समान तुम्हें पुत्रसे सुख नहीं मिलेगा; फिर भी तुम हठ करते जा रहे हो। तुम्हें केवल अपना स्वार्थ ही सूझ रहा है; अतः मैं तुमसे क्या कहूँ।'

अन्तमें ब्राह्मणका बहुत आग्रह देख संन्यासीने उसे एक फल दिया और कहा—'इसे तुम अपनी पत्नीको खिला देना। इससे उसके एक पुत्र होगा। तुम्हारी स्त्रीको चाहिये कि वह एक वर्षतक सत्य, शौच, दया और दानका नियम पालती हुई प्रतिदिन एक समय भोजन करे। इससे उसका बालक अत्यन्त शुद्ध स्वभाववाला होगा।' ऐसा कहकर वे योगी महात्मा चले गये और ब्राह्मण अपने घर लौट आया। यहाँ उसने अपनी पत्नीके हाथमें वह फल दे दिया और स्वयं कहीं चला गया। उसकी पत्नी तो कुटिल स्वभावकी थी ही। अपनी सखीके आगे रो-रोकर इस प्रकार कहने लगी— 'अहो ! मुझे तो बड़ी भारी चिन्ता हो गयी। मैं तो इस फलको नहीं खाऊँगी। सखी ! इस फलको खानेसे गर्भ रहेगा और गर्भसे पेट बढ़ जायगा। फिर तो खाना-पीना कम होगा और इससे मेरी शक्ति घट जायगी। ऐसी दशामें तुम्हीं बताओ, घरका काम-धंधा कैसे होगा ? यदि दैववश गाँवमें लूट पड़ जाय तो गर्भिणी स्त्री भाग कैसे सकेगी ? यदि कहीं शुकदेवजीकी तरह यह गर्भ भी [बारह वर्षोतक] पेटमें ही रह गया, तो इसे बाहर कैसे निकाला जायगा ? यदि कहीं प्रसवकालमें बच्चा टेढ़ा हो गया, तब तो मेरी मौत ही हो जायगी। बच्चा पैदा होते समय बड़ी असह्य पीड़ा होती है। मैं सुकुमारी स्त्री, भला उसे कैसे सह सकूँगी ? गर्भवती अवस्थामें जब मेरा शरीर भारी हो जायगा और चलने-फिरनेमें आलस्य लगेगा, उस समय मेरी ननद-रानी आकर घरका सारा माल-मता उड़ा ले जायँगी। और तो और, यह सत्य-शौचादिका नियम पालना तो मेरे लिये बहुत ही कठिन दिखायी देता है। जिस स्त्रीके सन्तान होती है, उसे बच्चोंके लालन-पालनमें भी कष्ट भोगना पड़ता है। मैं तो समझती हूँ, बाँझ अथवा विधवा स्त्रियाँ ही अधिक सुखी होती हैं।'

नारदजी ! इस प्रकार कुतर्क करके उस ब्राह्मणीने फल नहीं खाया। जब पतिने पूछा—'तुमने फल खाया ?' तो उसने कह दिया—'हाँ, खा लिया।' एक दिन उसकी बहिन अपने-आप ही उसके घर आयी। धुन्धुलीने उसके आगे अपना सारा वृत्तान्त सुनाकर कहा—'बहिन ! मुझे इस बातकी बड़ी चिन्ता है कि सन्तान न होनेपर मैं पतिको क्या उत्तर दूँगी। इस दुःखके कारण मैं दिनोंदिन दुबली हुई जा रही हूँ। बताओ, मैं क्या करूँ ? तब उसने कहा— 'दीदी ! मेरे पेटमें बच्चा है। प्रसव होनेपर वह बालक मैं तुमको दे दूँगी। तबतक तुम गर्भवती स्त्रीकी भाँति घरमें छिपकर मौजसे रहो। तुम मेरे पतिको धन दे देना। इससे वे अपना बालक