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पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,018 pages

Page 841 of 1018

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Page 841

८२४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण

निवास करते हैं। तदनन्तर नाना तीर्थोंमें भ्रमण करता
हुआ सारथि पापनाशिनी मथुरापुरीमें गया; यह भगवान्
श्रीकृष्णका आदि स्थान है, जो परम महान् एवं मोक्ष
प्रदान करनेवाला है। वेद और शास्त्रोंमें वह तीर्थ
त्रिभुवनपति भगवान् गोविन्दके अवतारस्थानके नामसे
प्रसिद्ध है। नाना देवता और ब्रह्मर्षि उसका सेवन करते
हैं। मथुरा नगर कालिन्दी (यमुना) के किनारे शोभा
पाता है। उसकी आकृति अर्द्धचन्द्रके समान प्रतीत होती
है। वह सब तीर्थोंके निवाससे परिपूर्ण है। परम आनन्द
प्रदान करनेके कारण सुन्दर प्रतीत होता है। गोवर्धन
पर्वतके होनेसे मथुरामण्डलकी शोभा और भी बढ़ गयी
है। वह पवित्र वृक्षों और लताओंसे आवृत्त है। उसमें
बारह वन हैं। वह परम पुण्यमय तथा सबको विश्राम
देनेवाले श्रुतियोंके सारभूत भगवान् श्रीकृष्णकी आधार-
भूमि है।

तत्पश्चात् मथुरासे पश्चिम और उत्तर दिशाकी ओर
बहुत दूरतक जानेपर सारथिको काश्मीर नामक नगर
दिखायी दिया, जहाँ शङ्खके समान उज्ज्वल गगनचुम्बी
महलोंकी पङ्क्तियाँ भगवान् शङ्करके अट्टहासकी भाँति
शोभा पाती हैं। जहाँ ब्राह्मणोंके शास्त्रीय आलाप सुनकर
मूक मनुष्य भी सुन्दर वाणी और पदोंका उच्चारण करते
हुए देवताके समान हो जाते हैं। जहाँ निरन्तर होनेवाले
यज्ञ-धूमसे व्याप्त होनेके कारण आकाश-मण्डल मेघोंसे
धुलते रहनेपर भी अपनी कालिमा नहीं छोड़ता। जहाँ
उपाध्यायके पास आकर छात्र जन्मकालीन अभ्याससे ही
सम्पूर्ण कलाएँ स्वतः पढ़ लेते हैं तथा जहाँ माणिक्येश्वर
नामसे प्रसिद्ध भगवान् चन्द्रशेखर देहधारियोंको वरदान
देनेके लिये नित्य निवास करते हैं। काश्मीरके राजा
माणिक्येशने दिग्विजयमें समस्त राजाओंको जीतकर
भगवान् शिवका पूजन किया था, तभीसे उनका नाम
माणिक्येश्वर हो गया था। उन्हींके मन्दिरके दरवाजेपर
महात्मा रैक एक छोटी-सी गाड़ीपर बैठे अपने अङ्गोंको
खुजलाते हुए वृक्षकी छायाका सेवन कर रहे थे। इसी
अवस्थामें सारथिने उन्हें देखा। राजाके बताये हुए
भिन्न-भिन्न चिह्नोंसे उसने शीघ्र ही रैकको पहचान लिया
और उनके चरणोंमें प्रणाम करके कहा—'ब्रह्मन् ! आप
किस स्थानपर रहते हैं ? आपका पूरा नाम क्या है ?
आप तो सदा स्वच्छन्द विचरनेवाले हैं, फिर यहाँ
किसलिये ठहरे हैं ? इस समय आपका क्या करनेका
विचार है ?'

सारथिके ये वचन सुनकर परम आनन्दमें निमग्न
महात्मा रैकने कुछ सोचकर उससे कहा—'यद्यपि हम
पूर्णकाम हैं—हमें किसी वस्तुकी आवश्यकता नहीं है,
तथापि कोई भी हमारी मनोवृत्तिके अनुसार परिचर्या कर
सकता है।' रैकके हार्दिक अभिप्रायको आदरपूर्वक
ग्रहण करके सारथि धीरेसे राजाके पास चल दिया। वहाँ
पहुँचकर राजाको प्रणाम करके उसने हाथ जोड़ सारा
समाचार निवेदन किया। उस समय स्वामीके दर्शनसे
उसके मनमें बड़ी प्रसन्नता थी। सारथिके वचन सुनकर
राजाके नेत्र आश्चर्यसे चकित हो उठे। उनके हृदयमें
रैकका सत्कार करनेकी श्रद्धा जाग्रत् हुई। उन्होंने दो
खच्चरियोंसे जुती हुई एक गाड़ी लेकर यात्रा की। साथ
ही मोतीके हार, अच्छे-अच्छे वस्त्र और एक सहस्र गौएँ
भी ले लीं। काश्मीरमण्डलमें महात्मा रैक जहाँ रहते थे,

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