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पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,018 pages

Page 826 of 1018

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Page 826

उत्तरखण्ड ] * वार्त्रघ्नी आदि तीर्थोंकी महिमा * ८०९
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ब्रह्माजी बोले— जो मनुष्य अज्ञानसे मोहित होकर तुम्हारे भीतर थूक या मल-मूत्र डालेगा, उसीके भीतर यह शीघ्र चली जायगी और वहीं निवास करेगी। इससे तुम्हें छुटकारा मिल जायगा।

श्रीमहादेवजी कहते हैं— सुरेश्वरि! इस प्रकार ब्रह्माजीकी आज्ञासे वह ब्रह्महत्या देवराज इन्द्रको छोड़कर चली गयी। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। पूर्वकालमें इन्द्रको इसी प्रकार ब्रह्महत्या प्राप्त हुई थी। इस वार्त्रघ्नी तीर्थमें तपस्या करके शुद्धचित्त होकर वे स्वर्गमें गये थे। पार्वती! साभ्रमतीके तीर्थोंमें 'वार्त्रघ्नी' का ऐसा ही माहात्म्य है।

वार्त्रघ्नी-संगमसे आगे जानेपर देवनदी साभ्रमती भद्रानदीके साथ-साथ वरुणके निवासभूत समुद्रमें जा मिली है। समुद्र भी साभ्रमतीके अनुरागसे उसका प्रिय करनेके लिये आगे बढ़ आया है और उसके प्रिय-मिलनको उसने अङ्गीकार किया है। भद्रानदी पूर्वकालमें सुभद्राकी सखी थी। उसने मार्गमें मूर्तिमती साक्षात् लक्ष्मीकी भाँति प्रकट होकर साभ्रमती गङ्गाकी सहायता की। उन दोनों नदियोंका पवित्र संगम समुद्रके उत्तर-तटपर हुआ है। उस तीर्थमें स्नान करके जो भगवान् महावराहको नमस्कार करता और स्वच्छ जलका दान करता है, वह वरुणलोकको प्राप्त होता है। उसी मार्गसे वराहरूपधारी भगवान् विष्णुने समुद्रमें प्रवेश करके देवताओंके वैरी सम्पूर्ण दानवोंपर विजय पायी थी। भगवान्ने जो वराहका रूप धारण किया था, उसका उद्देश्य देवताओंका कार्य सिद्ध करना ही था। वह रूप धारण करके वे समुद्रमें जा घुसे और पृथ्वीदेवीको अपनी दाढ़ोंपर रखकर कर्दमहालयमें आ निकले; इससे वहाँ वाराहतीर्थके नामसे एक महान् तीर्थ बन गया। जो मनुष्य वहाँ स्नान करता है, वह निश्चय ही मोक्षका भागी होता है। यहाँ पितरोंकी मुक्तिके लिये श्राद्ध करना चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष पितरोंके साथ ही मुक्त होकर अत्यन्त सुखद लोकमें जाता है।

वाराहतीर्थसे आगे संगम नामक तीर्थ है, जहाँ साभ्रमती गङ्गा समुद्रसे मिली है। वहाँ विधिपूर्वक स्नान और दान करना चाहिये। इस तीर्थमें स्नान करनेसे महापातकी भी मुक्त हो जाते हैं। स्वजनोंका हित चाहनेवाले पुरुषोंको वहाँ श्राद्धका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये। वहाँ श्राद्ध करनेसे मनुष्य निश्चय ही पितृलोकमें निवास करता है। जहाँ समुद्रसे साभ्रमती गङ्गाका नित्य संगम हुआ है, उस स्थानपर ब्रह्महत्या भी मुक्त हो जाता है। फिर अन्य पापोंसे युक्त मनुष्योंके लिये तो कहना ही क्या है। मन्दबुद्धि लोग जहाँ तीर्थ नहीं जानते, वहाँ मेरे नामसे उत्तम तीर्थकी स्थापना कर लेनी चाहिये।

संगमके पास ही आदित्य नामक उत्तम तीर्थ है, जो सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात है। उसका दर्शन अवश्य करना चाहिये। वहाँ स्नान करनेसे पुष्करमें स्नान करनेका फल होता है। मदार और कनेरके फूलोंसे भगवान् सूर्यका पूजन, श्राद्ध तथा दान करना चाहिये। यह आदित्यतीर्थ परम पवित्र और पापोंका नाशक है। महापातकी मनुष्योंको भी यह पुण्य प्रदान करनेवाला है। उस तीर्थके बाद नीलकण्ठ नामका एक उत्तम तीर्थ है। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको उसका दर्शन अवश्य करना चाहिये। पार्वती! जो मनुष्य बिल्वपत्र तथा धूप-दीपसे नीलकण्ठका पूजन करता है, उसे मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है। जो निर्जन स्थानमें रहकर वहाँ उपवास करते हैं, वे लोग जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करते हैं, उसे वह तीर्थ प्रदान करता है।

पार्वती! जहाँ साभ्रमती नदी दुर्गासे मिली है तथा जहाँ उसका समुद्रसे संगम हुआ है, वहाँ स्नान करना चाहिये। जो कलियुगमें वहाँ स्नान करेंगे, वे निश्चय ही निष्पाप हो जायँगे। दुर्गा-संगमपर श्राद्ध करना चाहिये। वहाँ जानेपर विशेषरूपसे ब्राह्मणोंको भोजन कराना और विधिपूर्वक गाय-भैंसका दान देना उचित है। यह साभ्रमती नदी पवित्र, पापोंका नाश करनेवाली और परम धन्य है। इसका दर्शन करके मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। पार्वती! साभ्रमती नदीको गङ्गाके समान ही जानना चाहिये। कलियुगमें वह विशेषरूपसे प्रचुर फल देनेवाली है।

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