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पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,018 pages

Page 823 of 1018

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Page 823

८०६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


उस तीर्थसे आगे चण्डेश नामका उत्तम तीर्थ है, जहाँ सबको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले भगवान् चण्डेश्वर नित्य निवास करते हैं। उनका दर्शन करनेसे मनुष्य अनजानमें अथवा जान-बूझकर किये हुए पापसे छुटकारा पा जाता है। सम्पूर्ण देवताओंने मिलकर एक नगरका निर्माण किया, जो भगवान् चण्डेश्वरके नामसे ही विख्यात है। वहाँसे आगे गणपति-तीर्थ है, जो बहुत ही उत्तम है। वह साभ्रमतिके समीप ही विख्यात है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य निस्सन्देह मुक्त हो जाता है। साभ्रमतिके पावन तटपर लोगोंकी कल्याण-कामनासे पृथ्वीके अन्य सब तीर्थोंका परित्याग करके जो भगवान् रुद्रमें भक्ति रखता हुआ जितेन्द्रिय भावसे श्राद्ध करता है, वह शुद्धचित्त होकर सब यज्ञोंका फल पाता है। उस तीर्थमें स्नान करके ब्राह्मणको वृषभ दान करना चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष सब लोकोंको लाँघकर परम गतिको प्राप्त होता है।

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वार्त्रघ्नी आदि तीर्थोंकी महिमा

श्रीमहादेवजी कहते हैं— महादेवि ! तदनन्तर उस तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ परम साध्वी गिरिकन्या वार्त्रघ्नीके साथ इन्द्रका समागम हुआ था। जो मनुष्य अपने मनको संयममें रखते हुए वहाँ स्नान करते हैं, उन्हें दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। जो पुरुष वहाँ तिलके चूर्णसे पिण्ड बनाकर श्राद्ध करता है, वह अपनेसे पहलेकी सात और बादकी सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। संगममें विधिपूर्वक स्नान करके गणेशजीका भलीभाँति पूजन करनेवाला मनुष्य कभी विघ्न-बाधाओंसे आक्रान्त नहीं होता और लक्ष्मी भी कभी उसका त्याग नहीं करती।

पूर्वकालमें वृत्रासुर और इन्द्रमें रोमाञ्चकारी युद्ध हुआ था, जो लगातार ग्यारह हजार वर्षोंतक चलता रहा। उसमें इन्द्रकी पराजय हुई और वे वृत्रासुरसे पुनः लौटनेकी शर्त करके युद्ध छोड़कर मेरी शरणमें आये। उन्होंने वार्त्रघ्नीके पवित्र संगमपर आराधनाके द्वारा मुझे सन्तुष्ट किया। तब मैंने आकाशमें प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिया। उस समय काश्यपी गङ्गाके तटपर मेरे शरीरसे कुछ भस्म झड़कर गिरा, जिससे एक पवित्र लिङ्ग प्रकट हो गया। उस शिवलिङ्गकी 'भस्मगात्र' नामसे प्रसिद्धि हुई। तब मैंने प्रसन्न होकर महात्मा इन्द्रसे 'कहा— 'देव ! तुम जो-जो चाहते हो, वह सब तुम्हें दूँ गा। इस वज्रकी सहायतासे तुम शीघ्र ही वृत्रासुरका वध करोगे।'

इन्द्रने कहा— भगवन् ! आपकी कृपासे उस दुर्धर्ष दैत्यको आपके देखते-देखते ही इस वज्रसे मारूँगा।

पार्वती ! यों कहकर इन्द्र पुनः वृत्रासुरके पास गये। उस समय देवताओंकी सेनामें दुन्दुभि बज उठी। एक ही क्षणमें इन्द्र प्रबल शक्तिसे सम्पन्न हो गये। युद्धकी इच्छासे वृत्रासुरके पास जाते हुए इन्द्रका रूप अत्यन्त तेजस्वी दिखायी देता था। महर्षिगण उनकी