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पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,018 pages

Page 1008 of 1018

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Page 1008

उत्तरखण्ड ]
* श्रीविष्णु-पूजनकी विधि तथा वैष्णवोचित आचारका वर्णन * ९९१


वैष्णव पुरुष निर्मल एवं रमणीय मृत्तिका ले उसे मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके ललाट आदिमें लगावे। आलस्य छोड़कर परिगणित अङ्गोंमें ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करे। उसके बाद विधिपूर्वक सन्ध्योपासना करके गायत्रीका जप करे। तदनन्तर मनको संयममें रखकर घर जाय और पैर धो मौनभावसे आचमन करके एकाग्रचित्त हो पूजा-मण्डपमें प्रवेश करे।

एक सुन्दर सिंहासनको फूलोंसे सजाकर भगवान् लक्ष्मीनारायणको विराजमान करे। फिर गन्ध, पुष्प और अक्षत आदिके द्वारा विधिपूर्वक भगवान्‌का पूजन आरम्भ करे। विग्रह स्थापित, स्वयं-व्यक्त अथवा शालग्रामशिला—कोई भी क्यों न हो, श्रुति, स्मृति और आगमोंमें बतायी हुई विधिके अनुसार उसका पूजन करना उचित है। वैष्णव पुरुष शुद्धचित्त हो गुरुके उपदेशके अनुसार भक्तिपूर्वक श्रीविष्णुका यथायोग्य पूजन करे। वेदों तथा ब्राह्मणग्रन्थोंमें बतायी हुई पूजा 'श्रौत' कहलाती है। वासिष्ठी पद्धतिके अनुसार की जानेवाली पूजाको 'स्मार्त' कहते हैं। तथा पाञ्चरात्रमें बताया हुआ विधान 'आगम' कहलाता है। भगवान् विष्णुकी आराधना बहुत ही उत्तम कर्म है। इस क्रियाका कभी लोप नहीं करना चाहिये। आवाहन, आसन, अर्घ्य, पाद्य, आचमनीय, स्नानीय, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल एवं नमस्कार आदि उपचारोंके द्वारा अपनी शक्तिके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक श्रीविष्णुकी आराधना करे।* पुरुषसूक्तकी प्रत्येक ऋचा तथा मूलमन्त्र—इन दोनोंहीसे वैष्णव पुरुष षोडशोपचार समर्पण करे। पुनः प्रत्युपचार अर्पण करके पुष्पाञ्जलि दे। वैष्णवको चाहिये कि वह मुद्राद्वारा भगवान् जगन्नाथका आवाहन करे। फिर फूल और मुद्रासे ही आसन दे। इसी प्रकार क्रमशः पाद्य, अर्घ्य, आचमन और स्नानके लिये भिन्न-भिन्न पात्रोंमें निर्मल जल समर्पित करे। उस जलमें माङ्गलिक द्रव्योंके साथ तुलसीदल मिला हो। इसके बाद उक्त दोनों ही प्रकारके मन्त्रोंसे प्रत्युपचार अर्पण करे। सुगन्धित तेलसे भगवान्‌को अभ्यङ्ग लगावे। कस्तूरी और चन्दनसे उनके श्रीअङ्गमें उबटन लगावे। फिर मन्त्रका पाठ करते हुए सुगन्धित जलसे भगवान्‌को स्नान करावे। तत्पश्चात् दिव्य वस्त्र और आभूषणोंसे विधिपूर्वक भगवान्‌का शृङ्गार करे। फिर उन्हें मधुपर्क दे तथा भक्तिके साथ सुगन्धित चन्दन और सौरभयुक्त सुन्दर पुष्प निवेदन करे। इसके बाद दशाङ्ग या अष्टाङ्ग धूप, मनोहर दीप और भाँति-भाँतिके नैवेद्य भेंट करे। नैवेद्यमें खीर और मालपूआ भी होने चाहिये। नैवेद्यके अन्तमें आचमन कराकर भक्तियुक्त हृदयसे कर्पूर-मिश्रित ताम्बूल निवेदित करे। फिर घीकी बत्तियोंसे आरती करके भगवान्‌को फूलोंकी माला पहनावे। तदनन्तर समीप जा विनीत-भावसे प्रणाम करके उत्तम स्तोत्रोंद्वारा भगवान्‌का स्तवन करे। फिर उन्हें गरुड़के अङ्कमें शयन कराकर मङ्गलार्घ्य निवेदन करे। उसके बाद पवित्र नामोंका कीर्तन करके होम करे। भगवान्‌को भोग लगाये हुए नैवेद्यसे जो शेष बचे, उसीसे अग्निमें हवन करे। प्रत्येक आहुतिके साथ पुरुषसूक्त अथवा मङ्गलमय श्रीसूक्तकी एक-एक ऋचाका पाठ करे। वेदोक्त विधिसे स्थापित अग्निमें घृतमिश्रित हविष्यके द्वारा उपर्युक्त मन्त्ररत्नका एक सौ आठ या अट्ठाईस बार जप करके हवन करना चाहिये और हवनकालमें यज्ञस्वरूप महाविष्णुका ध्यान भी करना चाहिये।

शुद्ध जाम्बूनद नामक सुवर्णके समान जिनका श्याम वर्ण है, जो शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले हैं, जिनमें अङ्ग-उपाङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेद-वेदान्तोंका ज्ञान भरा हुआ है तथा जो श्रीदेवीके साथ सुशोभित हो रहे हैं, उस भगवान्‌का ध्यान करके होम करना चाहिये। मन्त्रद्वारा होम करनेके पश्चात् नामोंका उच्चारण करके एक-एकके लिये एक-एक आहुति देनी चाहिये


* आवाहनासनाद्यैर्गन्धपुष्पाक्षतादिभिः। धूपैर्दीपैश्च नैवेद्यैस्ताम्बूलाद्यैर्नमस्कृतैः॥
कुर्यादाराधनं विष्णोर्यथाशक्ति मुदान्वितः। (२८०। ५७-५८)