एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)
by ओशो (आचार्य रजनीश)
Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)
About this granth
Ek Omkar Satnam (एक ओंकार सतनाम) is a collection of Hindi talks by Osho (Acharya Rajneesh, 1931–1990) on Guru Nanak's Japji Sahib. The Japji is the foremost composition of the Sikh tradition, standing at the opening of the Guru Granth Sahib and recited each morning. It begins with the Mul Mantar, "Ik Onkar Satnam Karta Purakh", from which the book takes its title.
In these discourses Osho goes through the pauris of the Japji in order and speaks on remembrance of the Name, hukam (the divine order), the guru, meditation and surrender. He illustrates his points with episodes from Nanak's life, stories of saints and his own familiar parables, and presents Nanak's devotion as a path that can be lived in the midst of household life.
The book is arranged in a series of chapters with a table of contents and runs to about 322 pages. It suits readers who want to approach the Japji and the Sikh sant tradition through the eyes of a modern spiritual speaker.
समझा दूँ? जब तक सब का सन्देह न, हो जाय तब तो केवल कहने से लाभ क्या
कह बैठते हैं, सो क्या सब लोग सब बातोंका यथार्थ स्वरूप जानते ही हैं? इसलिये
सब का, जिस बात में जो सन्देह हो सो निवारण हो जाय वही उत्तम
इससे आगे भी जो लोग ज्ञान रूपी अमृत पान करने की इच्छा रखते हैं; सुनो
सुनो, ऐसा ही कहूँ न? सो सुनो जी, सब लोग सब बातों को नहीं जान सकते कोई
किसी बात को, किसी बात को कोई दूसरा जाने, कोई किसी बात को न जानने
का दावा कर ले, सो तो योग्य नहीं, क्यों भला? सब तो सब नहीं! हां जो सर्वज्ञ हो,
सदा ऐसा व्यापक यथार्थ तत्त्व, सब बातें, सब के सब भावों को सदा जानता,
सो सर्व ज्ञानी कोई
संसार में तो सब लोग सब निमित्त रूप जान पड़े, यथा क्या? किसी को कोई
उपकार का काम पड़े, बस उ सी-को सब निमित्त ही तो हैं! इसलिये जिस बात
का जिस को निमित्त हो उस को उस का, सो भी निमित्त मात्र ही जान पड़ता
निमित्त तो संसार के निमित्त मात्र निमित्त से नाम मात्र सं-सार, सो यह भी
केवल सब निमित्त निमित्त ही तो है सब को, किसी को तो कुछ ज्ञान ही न हो
सो निमित्त ही क्या हो सके जो कुछ भी... न निमित्त कहलाने के ही निमित्त
से सब को सब में जान पड़े, जिस से कि सब को सब रूप जान पड़े।
सो परमात्मा केवल तो सब रूप सब सब स्वरूप ही, जो सब ज्ञान रूप सब
सब स्वरूप है, सो परमात्मा केवल केवल ही सब ज्ञान से हीन है? सब तो हीन
नहीं
ज्ञान सदा सब, "ज्ञान सब ज्ञान रूप सब रूप सब का"
सब का सब तो सब तरह से, सो केवल ज्ञान, सो सब का केवल ही ज्ञान
सब ही का रूप सब का ज्ञान केवल ही सब स्वरूप सब रूप जान पड़े, सो सब को
सदा सब सब स्वरूप सब स्वरूप केवल सब का, सो सब तो केवल स्वरूप ही
सब रूप रहा।
केवल सदा ही, सो परमात्मा सदा तो केवल ही ज्ञान ही ज्ञान रूप का ज्ञान
सब परमात्मा सदा ज्ञान रूप ही तो सो परमात्मा सदा सब का ज्ञान स्वरूप
परमात्मा से सब ही सदा ज्ञान रूप, सब ही, सदा ही सब ज्ञान रूप परमात्मा
सो सब केवल स्वरूप ज्ञान ज्ञान से सब को सब तरह से जान पड़े सब रूप सब
सदा सब के ज्ञान ही का केवल ही ज्ञान ही रूप, सब सदा परमात्मा केवल ही
सब सदा ज्ञान ही सब तरह सदा सदा ही ज्ञान सब ज्ञान
निमित्त से सब को सब ज्ञान ही सब ज्ञान रूप सब निमित्त से सब ज्ञान
सदा ज्ञान ही केवल ज्ञान, सो तो सब का सब ही स्वरूप
"सब का ज्ञान सदा केवल ज्ञान स्वरूप ही निमित्त केवल सदा ज्ञान
ज्ञान ज्ञान-ज्ञान सदा सब, केवल सब ज्ञान ज्ञान ही तो सब का"
परमात्मा तो सब तरह सब ज्ञान रूप ही तो सब का रूप ही ज्ञान रूप
सो तो सब का सब रूप सब केवल परमात्मा ही सब तरह से सब रूप सब
परमात्मा सदा ही ज्ञान ही तो सब सदा ही तो सब रूप
सब रूप सदा ही ज्ञान ही ज्ञान
केवल सब रूप सब रूप का, सो परमात्मा स्वरूप रहा, ज्ञानस्वरूप सदा
रहा, सो सब रूप सब रूप सब सदा ज्ञान ही, सब रूप सब रूप सब केवल रूप
सब तरह से, सो परमात्मा केवल सदा, सब तो केवल रहा, सो केवल सदा ही ज्ञान
रूप से केवल सब रूप सदा ज्ञान ही ज्ञान ही सदा ही, सब का रूप सब ज्ञान
स्वरूप ही सदा ही सो परमात्मा सब रूप ही सब का, सो ज्ञान रहा; सदा सदा
ही रहा ही, सो सदा रहा।
परमात्मा परमात्मा सब ही तो सब सब तरह सब रहा, सदा सदा रहा,
न सब रूप से, न सब तरह न सब तरह, न सब परमात्मा रूप सब स्वरूप ही सो
सदा ही केवल सदा केवल ज्ञान सदा, सो सब स्वरूप सो परमात्मा परमात्मा ही
स्वरूप रहा, केवल तो सब ज्ञान केवल ही तो ज्ञान रूप ही परमात्मा ही सब
स्वरूप रहा, सब परमात्मा ही सब ज्ञान रूप
सदा सदा रहा, "परमात्मा सदा सब ही केवल ज्ञान ही ज्ञान ही ज्ञान
रहा, सदा सब परमात्मा सदा ज्ञान ही सदा सब स्वरूप केवल सदा रहा"
सदा सदा रहा, सो तो सब केवल रहा, केवल ही केवल सदा स्वरूप
परमात्मा केवल परमात्मा सदा ज्ञान ही, सो निमित्त से सब ज्ञान सदा सं--सार
निमित्त से स्वरूप सं--सार ही तो सदा सदा सब का, सो तो तो केवल ही तो
321
इसके पहिले या पश्चात दोनों पक्षों का ऐसा कोई पत्र लिखा, या दस्तखत
उनको उनका हिस्सा जीवन-निर्वाह के तौर दिया गया था सो दिया गया व दिया गया, सो
भी या हमेशा के लिए या उस वक्त तक जबान बन्दी करने के मतलब से या जो कुछ समझ कर दिया
या उनका हक समझ कर दिया या दिया गया था सो दिया गया अगर सब कुछ दिया गया
"सर्वसम्मतया निर्णय किया गया, किसी का कोई हक बाकी नहीं, जिसे उस
सम्प्रदाय द्वारा दिया"
इसके पहिले या पश्चात दोनों पक्षों का ऐसा कोई पत्र लिखा, या दस्तखत
परस्पर का ऐसा कोई पत्र नहीं पेश किया गया या सम्मुख, कि जिसके आधार से
ऐसा सब कुछ सम्प्रदाय ने दिया ऐसा लिखा गया हो या जब कि इस प्रकार परस्पर लिखा
गया था
इसके दो वर्ष पश्चात्, जबानी जो बयान में साक्ष्य दिया गया सो इसके
बाबत पत्र या कोई पत्र के द्वारा यह जो सम्प्रदाय द्वारा दिया गया व सम्प्रदाय का निर्णय
हुआ, जिसके आधार पत्र को कहा गया वह पत्र पेश नहीं करवाया या सम्मुख लाया
या ऐसा पत्र सम्मुख पेश किया गया जिसका कोई आधार नहीं
इस स्थिति के सम्मुख तथ्य पर, जो जो पत्र उस वक्त से जबान बन्दी तक लिखे
या पत्र लिखे गये और जो जो पत्र के आधार लिखे गये, उन सम्मुख तथ्य लिखे पत्र
इसके तथ्य केवल यह सम्प्रदाय के आधार पक्ष के लिखे गये ऐसा निर्णय जो कि माना
गया सम्प्रदाय के द्वारा सब कुछ दिया गया, वह पत्र सम्मुख परस्पर आधार के पत्र
लिखे नहीं कहे जा
इस प्रकार सम्प्रदाय के पक्ष को कहा गया, ऐसा सम्प्रदाय द्वारा निर्णय व
तथ्य का होना या बयान इसके तहत, ऐसा भी इस पक्ष सम्प्रदाय के पक्ष का
निर्णय सामने आया या साक्ष्य इसके तहत, ऐसा भी इस पक्ष रूप पत्र या तो तथ्य का
ऐसा निर्णय किया गया जिसका कोई साक्ष्य
के सामने पेश नहीं था या इस तथ्य रूप पत्र का तथ्य नहीं कहा गया इसके
तहत जो सम्प्रदाय द्वारा निर्णय व साक्ष्य रूप पत्र सम्मुख पेश किया या,
ऐसा निर्णय व साक्ष्य रूप पत्र सम्मुख पेश न करवाया गया, सम्प्रदाय के तथ्य
रूप या पत्र रूप जो भी था, ऐसा निर्णय पक्ष तथ्य व पत्र, ऐसा सम्प्रदाय द्वारा
निर्णय नहीं कहा गया
कहा जा रहा था, ऐसा निर्णय पक्ष द्वारा किया गया होगा?
निर्णय किया गया? जो सम्प्रदाय इसके तहत माना गया वह निर्णय पक्ष का ही
माना जाना चाहिए? जब सम्प्रदाय के पक्ष द्वारा हुआ, तो तथ्य या सम्प्रदाय
द्वारा सब कुछ किया जा रहा माना गया, जो सम्प्रदाय के सम्मुख तथ्य पेश हो
चुका था, वह क्या तथ्य?
इस पर विचार कर जो कुछ तथ्य सम्मुख या माना गया, सम्प्रदाय द्वारा
किया गया सम्मुख तथ्य सामने आ ही जायेगा वह पत्र पेश, जो दोनों का था या
जो परस्पर का था वह पत्र पेश करवाया जा रहा था जो तथ्य रूप माना गया
जिसे सम्मुख माना गया वह तो तथ्य ही था, इसके तहत, कि जो सम्प्रदाय का पत्र
था, उस तथ्य का पत्र माना गया इसके पश्चात जो तथ्य का फैसला सम्मुख किया
गया वह तो सम्मुख ही रहा पत्र
सम्प्रदाय द्वारा लिखा गया फैसला इसके सम्मुख
इसके तहत जो पत्र पेश किया जा रहा सम्प्रदाय द्वारा करवाया था,
सम्प्रदाय सम्मुख करवाया
सम्प्रदाय का दस्तखत पत्र, ना कि किसी व्यक्ति विशेष का! सम्प्रदाय लिखा, उस
सम्मुख स्वरूप का व उस पक्ष का सम्मुख था, व उस पक्ष द्वारा लिखा गया पत्र या
ऐसा सम्प्रदाय के नियम के अनुसार तय था उस वक्त इसके पूर्व या बाद के समय ऐसा
ही लिखा
था अतः इस स्वरूप को सम्प्रदाय द्वारा कहा गया तथ्य या इसके रूप में माना
फैसला जब उस वक्त था व जो इसके तहत पेश हुआ इसके आधार पर यह तथ्य स्वरूप
इसके रूप में माना गया या इसके तहत केवल सम्प्रदाय पक्ष द्वारा माना गया जो
ऐसा फैसला या तथ्य रूप सामने रखा सम्प्रदाय 1980-81 व इसके रूप में
सम्प्रदाय द्वारा सम्प्रदाय द्वारा लिखा
जा चुका था
322