एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)
by ओशो (आचार्य रजनीश)
Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)
About this granth
Ek Omkar Satnam (एक ओंकार सतनाम) is a collection of Hindi talks by Osho (Acharya Rajneesh, 1931–1990) on Guru Nanak's Japji Sahib. The Japji is the foremost composition of the Sikh tradition, standing at the opening of the Guru Granth Sahib and recited each morning. It begins with the Mul Mantar, "Ik Onkar Satnam Karta Purakh", from which the book takes its title.
In these discourses Osho goes through the pauris of the Japji in order and speaks on remembrance of the Name, hukam (the divine order), the guru, meditation and surrender. He illustrates his points with episodes from Nanak's life, stories of saints and his own familiar parables, and presents Nanak's devotion as a path that can be lived in the midst of household life.
The book is arranged in a series of chapters with a table of contents and runs to about 322 pages. It suits readers who want to approach the Japji and the Sikh sant tradition through the eyes of a modern spiritual speaker.
दाता उस रूप को नहीं जानता जिसे जीवने रूप समझा रखा था इसीलिए दाता को यह सब
अस्वाभाविक सा प्रतीत होता था क्योंकि वह तो अद्वैतवादी सत्य का साधक प्रतीत होता
इसलिए वह तो सदा यही सोचता कि इस तरह शारीरिक सुख भोगने इच्छा जो भी जीव
धारण करता रहता वह तो न जाने किस संसार में, जो इस दृश्य संसार जैसा नहीं था तथा
जो चेतना का प्रतिरूप या छाया रूप रहा होगा, जो कभी वर्तमान जगत् का न होकरके भी
चेतनावस्थास्वरूप अपनी छाप इस पर छोड़ ही जाता होगा, काल्पनिकस्वरूप जैसा बनकर
दाता समझ रहा था कि संसारियों का सोचना तो संसार के विषय वासना युक्त व्यवहार
पर अवलम्बित या आधारित रहा होगा पर जिसे मुक्ति अथवा निर्वाण स्वरूप माना गया उसे
मानना चाहिए था, उस संसार के समस्त शारीरिक व्यवहार स्वरूप को तुच्छ समझना
तो स्वाभाविक रूप रहा होगा पर जिसे जीवन समझा जाता रहा, मुक्ति उस जीवन के समस्त
सांसारिक व्यवहारों का अंत, भले ही वह कुछ काल तक सांसारिक या वैयक्तिक या फिर
पारिवारिक रूप रहा
मुक्ति का तात्पर्य क्या? दाता तो यह समझ रहा था कि जीवने मुक्ति को,
जो साकार रूप दिया था उस रूप में जीव को कभी न कभी उस संचित शक्ति का रूप
दिया होगा, जिसे वह पुनः प्राप्त न कर सका तथा जीवन भर असीम दुख सहता
था, पर जो सब कुछ सह कर उस रूप को प्राप्त करता था, मुक्ति स्वरूप अवश्य ही
बन कर सब कुछ त्यागने का मन बना लेता होगा या, जो पा कर खोता होगा, जो पा
कर खो चुका होगा उसने जीवन भर मुक्ति रूप पाने का साधन अवश्य खोज लिया
ही होगा, उस खोज के आधार, जो भी स्वरूप या विचार रहा होगा उसी रूप
दाता को देखना चाहिए जीवन रूप को, जिसे वह समझ सकने योग्य
दाता विचार तो कर रहा था पर जीवन उस रूप से परे तथा दाता रूप से भिन्न
एक साकार रूप धारण किए हुए, जिसे वह समझने अथवा मानने योग्य न तो
शक्ति रखता था
"तू साकार हो या निराकार अपना बता"
या तो दाता को मन ही मन यह तय करना था या तय हो कर ही सब कुछ तय
करना था या जीवन-मरण रूप चक्कर को देखना था, जीवन-मरण का यह रूप जो
दाता देख रहा था स्वाभाविक ही प्रतीत होकर दाता को सम्मोहित सा, पर सब
कुछ रूप तो नहीं हो जाता यदि न दिखता दाता के सामने, मुक्ति का यही रूप
ही साकार रूप बना रहता तो दाता? क्या जीवन-मरण के बंधन से दाता को भी
बांध कर तो नहीं रखा जाएगा? तो दाता क्या तय करेगा? जो भी तय हो कर भी
सत्य न होगा जीवन-मरण रूप तो दाता का तय न तय ही रहेगा रूप तो तय रूप
अथवा जो नहीं होगा, तो स्वाभाविक रूप लेगा? या रहेगा ही? या दाता का भी
एक न रूप, साकार न हो होकर सम्मुख आकर जीवन रूप को ही स्वरूप का
ही रूप तो देकर रहेगा ही, या वास्तविक रूप बन दाता को घेरना प्रारंभ करेगा? या
दाता स्वयं ही, जो कुछ रूप नहीं समझ पाया होगा? या दाता ही
दाता रहेगा ही, या वास्तविक रूप जिसे समझना चाहिए?
जो भी हो या वास्तविक रूप ही तो तय करना था, पर यह समझ में
दाता के तो आ ही गया, पर दाता का तय रूप उस रूप के रूप में जो, दाता
तय करपाता या न, उस पर निर्भर था उस रूप उस रूप को दाता क्या
कहता, सम्भवत या तो अद्वैत, रूप तय रूप धारण कर दाता स्वरूप को घेर
रहा होगा तथा उस स्वरूप को दाता देख सकने योग्य रूप जीवन-मरण न होता
तो, मुक्ति रूप को दाता या तो या जीवन-मरण स्वरूप को देख रहा, जो रूप
दाता के सामने प्रकट हुआ
दाता बोल उठा, "तू अपना बता"
अब तो या तो दाता को समझना तय ही था जीवन स्वरूप, मुक्ति, दाता या
वास्तविक रूप का अस्तित्व या मुक्ति स्वरूप का सम्मुख स्वरूप या जो
जीवन रूप दाता के सम्मुख अठखेलियां करता हुआ जीवन-मरण रूप में, दाता
स्वरूप को समझना या तो स्वीकार करना रूप या तो समझना दाता रूप रूप रहा
ही था, जिसे जीवन दाता देख रहा था तो, रूप तो वास्तविक रूप दाता स्वरूप
दाता बनता ही, दाता रूप में ही सही था, मुक्ति रूप उस दाता रूप बन ही
रहकर दाता रूप ही तो बनता, दाता तो सब देखता रहता था दाता स्वरूप,
दाता का अस्तित्व खत्म था
जो भी हो दाता रूप तय नहीं था, दाता रूप था, दाता रूप का स्वरूप
जो दाता रूप में ही तो अपना स्वरूप समझ कर दाता को सम्बोधित किया था
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लेकिन क्या यह सब केवल किसी सीमा विशेष तक ही संभव नहीं रह जाता?यदि हाँ तो केवल
तब ही व्यक्ति निष्पक्षता की स्थिति को पा सकता है। जब किसी एक को त्यागने की विवशता
सामने खड़ी हो? निष्पक्षता की स्थिति केवल किसी की या तो या की अवस्था में
केवल तभी तक संभव है। व्यक्ति को अपने ही के संबंध में कभी कभी ऐसे ही कष्ट के
पार गुजरना
हो तो निष्पक्ष हो जाना कोई सरल बात नहीं है। इसके तो अपने ही किसी ऐसे संबंध
और निष्पक्षता के दो पाटों स्वरूप स्थिति पैदा होने लगती है, जैसे कि किसी व्यक्ति
को अपने किसी अति प्रिय सम्बन्धी जिसे वह बहुत चाहता हो उससे ही यह बात पता चले
कि वह न केवल गलत काम कर रहा है पर वह स्वयं भी निष्पक्षता के मार्ग से भटक रहा
अथवा उस पर किसी गंभीर आरोप के ही परिणाम स्वरूप उस व्यक्ति से अपना नाता संबंध
तोड़ लेना पड़ता रहा हो अथवा निष्पक्षता की खातिर न केवल उसे ऐसा करना पड़ा हो
बल्कि न केवल अपने ही सम्बन्धी, निष्पक्षता न्याय स्वरूप न केवल इस बात की पहल
उस की ओर से निष्पक्षता के रूप में हुई हो, बल्कि निष्पक्ष न्याय विचार पक्षधरता
दोनों ही में निष्पक्षता को हीन करने का आधार अथवा कारण तो बन ही रहा
निष्पक्षता तक पहुंचे बिना ही ऐसे-तैसे ही यह व्यक्ति ही, ऐसे-तैसे ही अपनी
निष्पक्षता को स्वयं सिद्ध कर
"हो सकता है, निष्पक्ष न्याय हेतु"
पर इस सब स्थिति के ही आधार विशेषाधिकार स्वरूप ही, यह निष्पक्षता केवल
तब निष्पक्ष तब मानी जाती जब तक किसी गलत न्याय की निष्पक्षता न होकर उस व्यक्ति
विशेष तक ही न रहकर उस विशेषाधिकार सब--विशेषाधिकार का रूप लिए हुए
भले ही वह उस के पक्ष में ही रहकर केवल निष्पक्षता का दावा करता रहता
निष्पक्ष न्याय न्याय न रह केवल पक्षधर केवल बनता, जो कि तब न्याय पक्ष बन जाता
न्याय केवल तब तक ही संभव निष्पक्ष माना जाता जब तक न्याय स्वरूप ही बना?
निष्पक्षता का यह रूप कि निष्पक्षता ही निष्पक्षता का ही रूप बन न्याय केवल
का आधार बना रहता न कि इस तरह निष्पक्ष माना जाने वाला न्याय पक्ष का रूप ले
सकता, न्याय निष्पक्ष न्याय बना रहता तो सही, न्याय स्वरूप, सब पर एक सा ही
निष्पक्ष कहा गया निष्पक्षता न्याय निष्पक्षता निष्पक्ष न्याय तो वह रूप है जो न्याय
का न्याय ही स्वरूप, उस सब से, निष्पक्ष सब पक्ष रूप को भी कह दे, ना कि सब
न्याय स्वरूप केवल न्याय स्वरूप बन ही न सके निष्पक्षता का ही रूप बना रहे।
निष्पक्ष पक्ष न्याय स्वरूप ना बनने से उस न्याय स्वरूप निष्पक्षता न्याय केवल
एक पक्ष के रूप बन कर केवल बन कर रह जाता निष्पक्ष ना कहला
न्याय रूप रहता ही? जहां न्याय ही ना हो वहां निष्पक्षता का रूप बन सब
पक्ष एक जैसा न्याय ना बने सब पर एक सा न्याय ना निष्पक्ष बन कर सब को
न्याय तो सब देवेगा, सब न्याय केवल सब न्याय का केवल ना बन कर, मात्र
निष्पक्ष न्याय का एक स्वरूप बनेगा, सब न्याय केवल मात्र सब न्याय के ही रूप
निष्पक्ष न्याय स्वरूप बन ही ना सकेगा, निष्पक्षता केवल ना बन, ना बनेगी,
ना केवल न्याय ही बन सब को न्याय देवेगा, ना केवल सब न्याय केवल बन ही
सकेगा निष्पक्ष तो सब न्याय के ही बन कर न्याय स्वरूप रहे।
जो सब न्याय स्वरूप, सब पर एक सा निष्पक्ष ही न्याय का स्वरूप ना बन सके
तो सब का भला कैसे हो सब न्याय सब को एक सा ना बने तो सब न्याय सब
का निष्पक्षता रूप, या विशेषाधिकार रूप ना बन सब न्याय का ही रूप बने,
न्याय तो सब एक समान
सब निष्पक्षता सब निष्पक्षता न तो व्यक्ति का सब का, न केवल न्याय ही
सब को निष्पक्षता दे सकता ना ऐसे-वैसे ही न्याय का रूप हो सब व्यक्ति सब
सब सब व्यक्ति केवल सब सब का रूप, न्याय सब व्यक्ति को केवल निष्पक्ष ही
सब बना सके
ऐसा न्याय बने, "प्रत्येक व्यक्ति सब को निष्पक्ष रूप"
जिस पर ना सब रूप का सब रूप ना बन सके; केवल न्याय केवल
ही ना बन कर निष्पक्ष सब पक्ष रूप को सब न्याय सब न्याय का न्याय स्वरूप न
बन केवल निष्पक्षता निष्पक्षता का नाम मात्र रूप केवल निष्पक्ष का न्याय रूप ही
निष्पक्षता को स्वयं रूप सब सब निष्पक्षता का नाम मात्र निष्पक्ष न्याय, केवल
स्वरूप का रूप ना रूप में सब के साथ ही, सब निष्पक्षता सब निष्पक्ष हो
सके सब रूप ही तो निष्पक्ष रूप
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- पृष्ठ संख्या: 315 (नीचे दाईं ओर)
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इस प्रकार जब अलग-अलग काम हो, अलग-अलग काम का भाव आध्यात्मिक साधना
का आधारभूतस्वत्व रूप समझना ही वास्तव में ईश्वर भक्ति माना जायगा, किसीका भी
अपमान न होगा, किसी काम पर भी यह भाव आयेगा, किसीका भी काम छोटा या निष्फल
नहिं रहा, प्रत्येक का ही काम परमेश्वर के सम्मुख रहने और उस की सन्निधानता रूप
एक आधार का सम्पादक माना ही जाय सब काल में, किसीका भेद ही न रहा-सबके
ही निष्काम कर्मयोग रूप अभ्यास के फल से सब को ही परम शान्ति प्राप्त हो सके
और उस परमपिता परमात्मा का साम्राज्य ही सत्य रूप, सब काल में सब प्रकार
सत्य स्वरूप ही माना जाय और सब काल अथवा में, जब तक संसार रहे, तब तक ईश्वर भक्ति
ही रहेगी
"सब को ईश्वर का प्रकाश रूप स्वरूप माना गया"
इस ऊपर लिखे हुए, प्रमाण के साथ, सब मत पंथ भी काम में, जो साधन का
फल आत्मिक शान्ति रूप अथवा स्व स्वमान्य को ठहराया गया हो, सब प्रकार यथार्थ माना
सब मतों द्वारा गया है, वास्तव में सब काल रूप साधन ईश्वर सम्बन्धी प्रमाण रूप
का आधार ही अभ्यास रूप से आत्मिकस्वरूप के प्रकाश रूप में ही सब मतों द्वारा
माना गया, तो सब मतों का परम आधार ही आत्मिक सत्य रूप
प्रकाश ही आत्मिक रूप से सब मत पंथ वालों को प्रिय है, तो जो भी जिस भी
प्रकार उस प्रकाश रूप परमात्मा रूप को ही मान कर ही उस का ही अभ्यास करता
हुआ उस परम प्रकाश को आत्मिक रूप से ही प्राप्त करना चाहता है उसका यह भाव
सब प्रकार से ही सत्य समझा गया सब काल रूप में, जब कि आत्मज्ञान रूप सब
प्रमाण सब को ही एक ही भाव में सत्य ज्ञान-स्वरूप रूप परमात्मा का माना
गया और सब मत पंथों के तत्व रूप आधार को सत्य ही मान कर सब प्रकार से ही
अभ्यास को सब काल स्वरूप माना तो जो विरोध का भाव सब काल प्रत्येक मतों
का आपस में चला आ रहा माना, उसका आधार किस पर ही माना गया? प्रत्येक मत ही
सब प्रकार के अभ्यासक गण, केवल शास्त्र के ही वचन द्वारा अपने मत की
बड़ाई करते हुए दूसरों रूप अपने विरोधी माना गया अथवा सब गैर-मुसलमानों
को काफिर माना गया
जिस प्रकार, "सब संसार का प्रकाश रूप माना गया"
सब परमात्मा का प्रकाश रूप ही सब मत पंथ वाले आधार रूप मानकर सब प्रकार
विरोध भाव को क्यों रूप बना रहे? उसका भाव यही था, केवल शास्त्र की बड़ाई
द्वारा ही, किसी भी प्रमाण को आत्म-साक्षात्कार यथार्थता के सम्मुख नहीं माना गया
केवल ही अपने ही सम्प्रदाय शास्त्रार्थ परम्परा के अनुसार बड़ाई का रूप सब
ने ही, सब का आधार ही केवल अपने साम्प्रदायिक स्वरूप को ही ठहराया, उस कारण
सब सम्प्रदाय, सब काल ही एक दूसरे दृष्टिकोण सम्प्रदाय रूप से असत्यता
ठहराकर सब को आपस में अधर्मी रूप मान करके आपस में विरोधी भाव रूप हो रहे
थे सो, अज्ञानता के कारण ही, सब काल ऐसा रूप ही संसार में देखा गया
इस अज्ञानता का आधार केवल ही अपने साम्प्रदायिक स्वरूप का रूप ही प्रमाण
ठहराया गया और सब को अधर्म रूप ही माना गया, तो जो आत्मिक सत्य का प्रमाण
था, केवल शास्त्र ज्ञान रूप का आधार परमात्मा के प्रकाश रूप द्वारा प्रत्येक
का आधार तो एक रहा, सब संसार का, सब प्राणियों का ही, जो ज्ञान-रूप सब का
मूल सब का कारण प्रकाश रूप ही रूप सम्प्रदायों का आधार बताया, उसी ज्ञान
सम्बन्धी भाव को, त्याग दिया गया
जिस का अभ्यास ही आत्मिक रूप सब मत या पंथ परमात्मा सम्बन्धी भाव
द्वारा सब सम्प्रदाय को ही सब ही आत्मज्ञान का अभ्यास रूप सब को सब ही काल
रूप में सब काल अभ्यास द्वारा, केवल, केवल, ही ज्ञान द्वारा पाया
जिस का प्रकाश ही परमात्मा स्वरूप रहा, तो फिर झगड़े का क्या रहा? क्या सब एक
रूप ही, सब परमात्मा रूप ही सब ज्ञान रूप नहीं है? तो फिर झगड़ा ही कैसा?
जब सब परमात्मा का स्वरूप है! फिर सब का भाव एक ही परमात्मा स्वरूप प्रकाश
ही रहा है? सब को एक ही तो, जिस भी रूप से, उस ईश्वर को ही न पा, सब
मत वाले उस प्रकाश को पायेंगे? फिर झगड़ा कैसा है? केवल ही केवल नाम,
रूप-रंगों का भिन्न स्वरूप है? गुण-धर्मों का भेद कहां रूप दिखता?
सब ही ईश्वर के काम को ही सब अपने स्वरूप को साधन माना है, जिस
प्रकार काम ही, अपने भाव द्वारा अपने काम रूप को ईश्वर का ही रूप मान कर
यथार्थता से, हर प्रकार सब काम को केवल फल-दाता सब का जन-दाता ही
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विचार कर मनुष्य किसी शुभ संकल्प रूप धन द्वारा अपनी आत्मा का उद्धार कर सकता है। अन्यथा
वह दुर्गति को पाता।
सम्भवतः, स्वामी जी सोचते थे; यद्यपि समाज की शक्ति क्षीण, उत्साह मन्द हो चुका था
तथा लोग मोह निद्रा में सो कर अकर्मण्य बनते थे, परन्तु धर्म कथा द्वारा उनके हृदय में ज्ञान,
दया, वैराग्य तथा भक्ति भाव उत्पन्न हो सकता, इसलिए लोग धर्म
कथा श्रवणोत्सुकता को जब देश-देश में जा कर देखते थे समाज की दुर्दशा जागृत
थी, अज्ञान अन्धकार से समाज को जगाने का यत्नशील हुआ करते थे। अनेक सम्प्रदाय बनते
जाते थे तथा वे सम्प्रदायवादी ही, विशेष कर अद्वैतवाद या मायावादका पाठ
ही जन साधारण जन को पढ़ा कर निष्क्रिय बना रहे थे। जब तक जैन धर्म प्रचार
तथा श्वेताम्बर सम्प्रदाय, स्थानक, तेरहपंथ अनेक शाखा तथा उपशाखा का सम्प्रदाय फल
फूला, स्वामी जी इन सम्प्रदायों की क्रिया रूप धर्म का फल शून्य ही, पा रहे थे।
ऐसा था, इस पर भी वे जैन धर्म सम्प्रदाय का रूप धारण किये
"सच्चे जैन ही स्वरूप का उपदेश देना अपना कर्तव्य था।"
इस प्रकार विचार कर, जनसाधारण वर्ग के अन्तर आत्मा जगाना आवश्यक समझकर ही
केवल साधुवर्ग तक उपदेशामृत रस जन जन्य पाकर ही जन कल्याण की आशा ही
कल्याण रूप हो सकती
साधक लोक को उपदेश देने का जो भाव था सो केवल जन कल्याण की भावना थी।
सम्प्रदाय की सीमा रूप मर्यादा रक्षा करना उद्देश्य न था, इस कारण कभी कभी वे
समाज के उन अंग को भी जो जैन मर्यादा तथा आचार विरुद्ध था, उस पर चोट
किया कर सुधारने का यत्न भी करते थे, जन जन को न तो सम्प्रदाय विशेष माना
अथवा प्रचारित करते थे। केवल जनसाधारण आत्मा कल्याण तथा जन कल्याण की दृष्टि
सब में साम्य भाव लाते हुए ही वे सब धर्म का उपदेश दे रहे थे।
केवल धर्म का उपदेश ही वे देते थे। जन-कल्याण जन-मंगलकारी वाणी के
द्वारा संसार के जीव, भव्य, भव्य, अभव्य, साधारण, जन कल्याण परम्परा में सब
स्वरूप प्राप्त करने का साधन हो सकता था इसलिए उपदेश दिया करते थे जन, जन
की आवश्यकता थी, सो उनकी दशा सुधारने उपाय करने, सब का भला करने का धर्म
ही जन हित रूप धर्म कहा गया, इस से, वे केवल
यह धर्म का प्रचार करने का यत्न ही कर समाज का भला करने विचार करते हुए भी
जन का भला तो समाज का भला स्वयं हो जायगा न? सो विचार कर धर्म ज्ञान? का
उपदेश दे रहे थे। जन समाज की दुर्बलता को सुधारना हो तो, जन को अपनी भूल
जान कर, उस का परिहार कर लेना, यह ही आत्मोद्धार का मार्ग था सो स्वयं
धर्म कथा उपदेश द्वारा किया जा रहा, इस प्रकार विचार? सो जन समाज, अपने
कर्तव्य कर्म जाग कर जन साधारण सुधार सम्भवशील हो सकता था, इसी लिए
स्वामी ज्ञान कथा रूप में सम्प्रदाय प्रचार विचार न कर सब समाज सुधार तथा जनसा
मारक पथ का ही पथ बना रहे, जिस पथ पर सब ही जन समाज निर्भय हो कर चल
कर, आत्मिक कल्याण लाभ जनसाधारण को प्राप्त हो सकता था। यही विचार
स्वामी आत्माराम जी द्वारा
जन साधारण को समाज रीति-नीति तथा मर्यादा-विधि का जो ज्ञान था।
सो तो सब जन ज्ञात, सो प्रत्येक को ज्ञान करा, सब को ज्ञान योग्य बनाने का धर्म
उपदेश दिया जा रहा तथा समाज की उस मत को जो दुर्बल बना रहा था। धर्म ग्रन्थ-
ज्ञान का साधन तो बना ही लिया तथा जन-साधारण को सरल लोक-भाषा
शैली से अवगत करवाया भी, उस सब ज्ञान प्रचार को सब प्रकार सुगम करने ज्ञान
दान की प्रथा को भी, घर घर तक फैला
समाज का सब व्यक्ति ही आत्मवान होकर सब का संरक्षक बन सके, ऐसी
सम्भावना सम्प्रदाय से सम्भव न थी जब तक प्रत्येक व्यक्ति को यह ज्ञात न हो कि
वह जीव-जगत का रक्षक तथा पोषक ही कर्तव्यवान बने तथा आत्म-रूप ही
अपने आत्मा को सब जीव रूप में ही सब जन जाने, तभी तो हो सके! सो
उपदेश ही सब जन कल्याण वाणी का जन जन तक प्रसार किया गया
इस प्रकार उन का यह, जन जन्य जीवन का ज्ञान मार्ग सब को सब तरह से
स्पष्ट, सब जन का हो, जनसाधारण रूप से जीवन ज्ञान युक्त हो कर जन समूह,
सब जन का हो, सब को आत्म स्वरूप का ज्ञान करा कर लोक धर्म जन जन तक,
ऐसा ही मार्ग पर चलाकर जन कल्याण को ही, जन जन कल्याण कल्याण स्वरूप
लोक कल्याण का रूप देकर ही लोक रूप जन जन का जन जन को, धर्म का ज्ञान
कराना ही सम्भवता
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इस प्रकार मन्दोदरी विलाप करने लगी, विलाप करते हुए उसका सारा शरीर पसीने पसीने होकर
पृथ्वी पर गिर पड़ा तथा वह भूमि लोटने लगी तब रावण की पटरानियों सहित सब रानी मिलकर शोक
विह्वल हो रोने लगी, मन्दोदरी शोक विह्वल होकर अपने सिरके बालोंको नोचकर विलाप करने लगी, उस समय
सब रानी कहने लगी, मन्दोदरी तुम धीरज धरो तथा अपने सिरके बालों को व्यर्थमत नोचो इसके उपरान्त
मन्दोदरीने विलाप कर मन्दोदरी कहने लगी रावण सब प्रकार का रूप बदल लेता था अनेक प्रकार का रूप धरता था
अनेक प्रकारके स्वरूप लेता
"इसके सब स्वरूपों तथा इसके रूपको अब श्रीरामके बिना दूसरा कौन जानेगा"
इसके उपरान्त विभीषण विलाप करने लगा, यह कहकर; आकाशवाणी होकर सबने सुना कि
रावण जीता--है विभीषणने यह सुनकर कहा जिस प्रकार कमल सूर्यके बिना अथवा कमलके फूलके
बिना जल का सरोवर निष्फल हो रहा इसी प्रकार विभीषण कहने लगा कि मेरा जीवन निष्फल हो जायगा
पश्चात् सब, इस बात जानकर व्याकुल होकर रोने लगे इसके उपरान्त श्रीराम के सम्मुख विभीषण हाथ
जोड़कर खड़ा हो कहने लगा कि मेरा संसार व्यर्थ, इसके उपरान्त श्री राम लक्ष्मणके चरणोंमें गिर
अपना सिरपटक दिया
"अब इस समय काम-क्रोधादिक जीतकर ले, अब यह तो सब बात तुम त्याग देवो"
लक्ष्मण कहने लगे कि हे राम अब देर न करो विभीषण को राज्यतिलक कर सब विदा करो,
विभीषणके ऊपर छत्र ला दो व मुकुट ला दो तथा विभीषण को राज्य सौंपो, एक छत्र राज होगा, इस प्रकार
सब कहो, सब प्रकार रावण मारा गया सबहीने, इस बात सबहीने, इस बात सब कहो रावणके
ऊपर, फूल बरसाने लगे, सब लोग राम नाम लेने लगे सब देवता सब मिलकर काम-क्रोधादिक
त्याग कर, प्रभु की जय जय करके चले
कोई तो फूल बरसा रहे विमानमें
किसी समय किया विभीषणने
"इसके उपरान्त कहा, कि अब काम-क्रोधादिक को जीतकर सब प्रकार काम करना चाहिये"
"सब कोई कहो, रावण मारा गया सब प्रकार रावण मारा गया तथा इस बात को सब सुनो और
विचार करो सब जीव तथा सब कोई काम-क्रोधादिक त्याग देवो प्रभुके नामका सिमरन
कर संसारके बन्धनों सहित छूटोगे सब यह काम-क्रोधादिक त्याग करो, संसार सब काम त्याग
कर प्रभु नाम जाप करो मुक्ति पावेगा सब, विभीषणके ऊपर छत्र ला दो मुकुट पहिना दो
राज्य पर टीका करो, इसके बाद विभीषणको गद्दीपर बैठाकर श्री रामने सब वानरोंको विदा
कर दिया जावो"
प्रथम विदा सुग्रीव करो अंगद जावो सुजान
वानर दल सब विदा करो विदा किये भगवान
नलनील विभीषण मिलत दोनों परस्पर
राजा गये निज धाम को लंका में विभीषण
सीता लाये विमान में चढ़ाये रघुनाथ
भरत के मन सोच भारी मिले रघुनाथ
राम के चरणन विभीषणने शीश नवाया सब को दिया प्रणाम
"सब कहियो"
इसके बाद, सबने श्री राम को प्रणाम कर विदाको आज्ञा पायी, लक्ष्मण कहने लगे
विदा करो सब वानर समाजको, तब सब वानरोंने विदा मांगकर हाथ जोड़े, लक्ष्मण
कहने लगे सुग्रीव तुम अपने घरको जाओ विभीषण को राज्य पर बैठाया तथा सब वानरोंको फूल माला
देकर सब विदा
इसके बाद विभीषण हाथ जोड़ अपने घरको जाने लगे सुग्रीव जा रहे हैं सब वानरोंको विदा
करके सब विदा हुए, सब वानर अपने अपने देश को चले गये विभीषणने लंका
महाराज को सिंहासन दिया तथा विभीषण सबको वस्त्र दिये सब लोग कपड़ा पहनकर
चले, इसके उपरान्त सुग्रीव, अंगद अपने अपने देशको लौटने लगे तथा सब वानर अपने
देश, इसके उपरान्त मन्दोदरी को विभीषणने कहा, कि श्रीराम के चरणोंमें ध्यान
लगाकर सब प्रकार का जप तप करो प्रभुका, नाम जपते रहियेगा! विभीषण को राज्य हुआ,
सब लोग खुश हुए, सब नर नारी अपने अपने देशको लौटगये सबहीने प्रणाम
किया सब एक दूसरेको विदा किया! इस तरह सब गये, सब जन सुखी, सब प्रकार सब
का काम सिद्ध हुआ प्रभु की आज्ञा पाकर, सब अपने अपने देश, सुखपूर्वक चले गये कोई
चिन्ता
शेष नहीं रही, विभीषण सब वानरों को व सुग्रीवको प्रणाम कर सब को
विदा करके अपने घरको, विभीषण अपने घर गये विभीषण सब लोगों अपने अपने घरको
सिधारे सब, सुग्रीव सब, वानर सब चले गये विभीषण ने दोनों हाथ जोड़कर सब वानरों
तथा राजा सुग्रीव को प्रणाम किया सब को टीका कर, तिलक दे; सब वानर चले, इसके उपरान्त
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तब राजा दण्डवत प्रणामकरि, उन सात महात्माओं पास हाथ जोरि जो बोले सो सुनिये।
हे स्वामी ! कृपा करि यह कहो, महाराज दशरथ अपने भवन पर प्रसन्न सहित आन विराजैं कहूँ
नहीं वा, उनकूँ कोई दुःख विघन व्यापैगा नहीं?
तबहीं विश्वामित्र बोले, "राजा जनक, तुमारे मनोरथ, सबही पुरेंगे"
राजा को ऐसा आश्वस्तकरि सब ऋषि जो विश्वामित्र सहित मिथिला नगरीकूँ
पधारे तहां सकल लोग हर्षित भये। सब देवगण भी जो विमान पर सवार होय आकाश में
से पुष्प-वर्षाकरते भये वा बाजे बाजे, नगर वासी प्रसन्न होय राजा को भेंट दिये वा
बधाईयां दी, आनन्द के मंगल कलश साजे गए वा, सब पुर को साज-सँवार
करि के, वन्दन-वार बांधे वा, चन्दन केसर अगर कपूर से सब बाज़ार को छिड़क दिया, जगह
जगह स्वर्ण कलश धरे वा ध्वज पताका फहरा दिये
पश्चात् विश्वामित्र सब ऋषि सहित पुर के मध्य में पधारे जनसमूह दर्शन करि करि
पांयन परन लगे, विश्वामित्र जी आशीर्वाद देतेय हुए राजा जनक सहित राज मन्दिरकूँ
पधारे। विश्वामित्र महामुनि सब ऋषिन समेत आसन बिछे हुएन पर विराजे वा जन समूह
चरणामृत लाय वा पान बीड़ा देकर वा चन्दन अतर आदि से सब की पूजाकारि हाथजोड़
स्तुति की तदनन्तर, राजा विश्वामित्र चरणकूँ धोय के चरणामृत सब कुटुम्ब के लेवाय,
चरणामृत पी, पाद्य अर्ध्य दे, षोडशोपचार सहित पूजन करि विश्वामित्र सहित सब
ऋषिन को हाथ जोड़ करि, हाथ बांध के प्रणामकरि के बैठ गये। राजा को विश्वामित्र ने
फिर आश्वस्तकरि कहा कि सीताजीकूँ बुलाय ल्याओ, तब राजा जनक ने सीताजीकूँ
आज्ञा भिजवाई तब सब सखी सीताजीकूँ लाय के, विश्वामित्र जी, शतानन्द गुरु
सहित जितने भी मुनिगण विश्वामित्र के, शुभागमन निमित्त एकत्रित हुये सबको पांयन
पराय शीश नवायन कराया वा मुनि आशीर्वाद देय जनक सहित सब सभा आनन्दित
भई। पश्चात् विश्वामित्र बोले, जनक जी सुता तुम्हारी, सबही भांति से धन्य हो धन्य
जनकजी की जय बोलते हुए बोले
"धन्य जनक"
सब सभा भी जनकजी महाराज की जय जय बोल के जयजय शब्दकरि प्रसन्न भये
पश्चात् सब मुनि आज्ञा ले अपने निज आश्रम गये, पश्चात्
"दूत का प्रस्थान"
श्री राम विश्वामित्र गुरु, शिव--धनुष, सीता विवाह, स्वयंवर, मिथिला नगरी
दशरथजी को सब समाचार सुनाने को एक योग्य दूत को आज्ञा की विश्वामित्र जी, शीघ्र अयोध्या
को प्रस्थान करो राजा जनक से, सतानन्द, जनक, विश्वामित्र जी राजा दशरथ को पत्रिका
दो, शीघ्र गमन कर अयोध्या प्रवेश करो वा, हाथी, रथ, पदातिक
सब साथ कर के दूत को रवाना कर, दूत शिव--धनुष भंजन वा स्वयंवर सब हाल
ले गया जी, जो पत्रिका विश्वामित्र जी की वा राजा जनक जी ने पत्रिका दी थी
विश्वामित्र विश्वामित्र आज्ञा से सब वृतान्त राजा दशरथ जनकजी स्वयंवर का सब
समाचार लेकर दूत जो गए वह शीघ्र तीन दिन चलकर अयोध्या नगरी पहुँचे।
तब दूत नगर में प्रवेश हुए वा सब महल देखे महल के आगे सब द्वारपाल बैठे
व दरबान, इन को विश्वामित्र आज्ञा अनुसार व पत्रिका दिखलाय कर भीतर को प्रवेश,
दूत का सम्मान, राजा दशरथ को समाचार कहा महाराज अयोध्याधीश की जय जयकार
कर हाथ जोड़ व सिर नवाकर पत्रिका दी, व कहा सब हाल विस्तार
दूत को सब हाल सुना हुआ, शिव--धनुष टूटना सीता विवाह की बात सुन
सब अयोध्या नगरी हर्षित भई राजा दशरथ सहित सब पुर में आनन्द ही आनन्द
मंगल गान होने लगे वा सब पुर के लोग यह मंगल बात पर विश्वामित्र राम की प्रशंसा
करने लगे। तब राजा ने सब मन्त्री वा पुरोहितोंकूँ आज्ञा दिवाई कि सब सेना
को भी सुसज्जित कराओ, पश्चात् दशरथ अपनी रानी को यह सब सुनाया, तब सब रानियां
प्रसन्नता पूर्वक हाथ जोड़ कर बोलीं
"राम जी सब दुख हरने वाले हैं, सीता बहू समेत हम सब भेंटेंगे"
सब पुर लोग प्रेम से भर गये सब लोग जय जय जयकार बोलने लगे वा सीता जी,
मिथिलापुरी राजा जी की कीर्ति को अपने मुख कहते सब पुर के, मिथिलापुरी राजा
की जय जयकार के नारे लगने लगे
सब अयोध्यावासी प्रसन्न हुये वा, विश्वामित्र गुरुजी राम लक्ष्मन की जय जयकार
बोलने लगे वा सब लोग मिलकर जो बधाई गान करने विश्वामित्र गाथा गाय गाय
आभूषण लुटाने की आज्ञा करी
सब लोग धन्य धन्य कह के बोले धन्य, जनक राजा को, जिनकी सुपुत्री सीता
जिनके साथ श्री राम का सम्बन्ध हुआ? फिर विश्वामित्र गुरुजी? की जय जय राम
320
समझा दूँ? जब तक सब का सन्देह न, हो जाय तब तो केवल कहने से लाभ क्या
कह बैठते हैं, सो क्या सब लोग सब बातोंका यथार्थ स्वरूप जानते ही हैं? इसलिये
सब का, जिस बात में जो सन्देह हो सो निवारण हो जाय वही उत्तम
इससे आगे भी जो लोग ज्ञान रूपी अमृत पान करने की इच्छा रखते हैं; सुनो
सुनो, ऐसा ही कहूँ न? सो सुनो जी, सब लोग सब बातों को नहीं जान सकते कोई
किसी बात को, किसी बात को कोई दूसरा जाने, कोई किसी बात को न जानने
का दावा कर ले, सो तो योग्य नहीं, क्यों भला? सब तो सब नहीं! हां जो सर्वज्ञ हो,
सदा ऐसा व्यापक यथार्थ तत्त्व, सब बातें, सब के सब भावों को सदा जानता,
सो सर्व ज्ञानी कोई
संसार में तो सब लोग सब निमित्त रूप जान पड़े, यथा क्या? किसी को कोई
उपकार का काम पड़े, बस उ सी-को सब निमित्त ही तो हैं! इसलिये जिस बात
का जिस को निमित्त हो उस को उस का, सो भी निमित्त मात्र ही जान पड़ता
निमित्त तो संसार के निमित्त मात्र निमित्त से नाम मात्र सं-सार, सो यह भी
केवल सब निमित्त निमित्त ही तो है सब को, किसी को तो कुछ ज्ञान ही न हो
सो निमित्त ही क्या हो सके जो कुछ भी... न निमित्त कहलाने के ही निमित्त
से सब को सब में जान पड़े, जिस से कि सब को सब रूप जान पड़े।
सो परमात्मा केवल तो सब रूप सब सब स्वरूप ही, जो सब ज्ञान रूप सब
सब स्वरूप है, सो परमात्मा केवल केवल ही सब ज्ञान से हीन है? सब तो हीन
नहीं
ज्ञान सदा सब, "ज्ञान सब ज्ञान रूप सब रूप सब का"
सब का सब तो सब तरह से, सो केवल ज्ञान, सो सब का केवल ही ज्ञान
सब ही का रूप सब का ज्ञान केवल ही सब स्वरूप सब रूप जान पड़े, सो सब को
सदा सब सब स्वरूप सब स्वरूप केवल सब का, सो सब तो केवल स्वरूप ही
सब रूप रहा।
केवल सदा ही, सो परमात्मा सदा तो केवल ही ज्ञान ही ज्ञान रूप का ज्ञान
सब परमात्मा सदा ज्ञान रूप ही तो सो परमात्मा सदा सब का ज्ञान स्वरूप
परमात्मा से सब ही सदा ज्ञान रूप, सब ही, सदा ही सब ज्ञान रूप परमात्मा
सो सब केवल स्वरूप ज्ञान ज्ञान से सब को सब तरह से जान पड़े सब रूप सब
सदा सब के ज्ञान ही का केवल ही ज्ञान ही रूप, सब सदा परमात्मा केवल ही
सब सदा ज्ञान ही सब तरह सदा सदा ही ज्ञान सब ज्ञान
निमित्त से सब को सब ज्ञान ही सब ज्ञान रूप सब निमित्त से सब ज्ञान
सदा ज्ञान ही केवल ज्ञान, सो तो सब का सब ही स्वरूप
"सब का ज्ञान सदा केवल ज्ञान स्वरूप ही निमित्त केवल सदा ज्ञान
ज्ञान ज्ञान-ज्ञान सदा सब, केवल सब ज्ञान ज्ञान ही तो सब का"
परमात्मा तो सब तरह सब ज्ञान रूप ही तो सब का रूप ही ज्ञान रूप
सो तो सब का सब रूप सब केवल परमात्मा ही सब तरह से सब रूप सब
परमात्मा सदा ही ज्ञान ही तो सब सदा ही तो सब रूप
सब रूप सदा ही ज्ञान ही ज्ञान
केवल सब रूप सब रूप का, सो परमात्मा स्वरूप रहा, ज्ञानस्वरूप सदा
रहा, सो सब रूप सब रूप सब सदा ज्ञान ही, सब रूप सब रूप सब केवल रूप
सब तरह से, सो परमात्मा केवल सदा, सब तो केवल रहा, सो केवल सदा ही ज्ञान
रूप से केवल सब रूप सदा ज्ञान ही ज्ञान ही सदा ही, सब का रूप सब ज्ञान
स्वरूप ही सदा ही सो परमात्मा सब रूप ही सब का, सो ज्ञान रहा; सदा सदा
ही रहा ही, सो सदा रहा।
परमात्मा परमात्मा सब ही तो सब सब तरह सब रहा, सदा सदा रहा,
न सब रूप से, न सब तरह न सब तरह, न सब परमात्मा रूप सब स्वरूप ही सो
सदा ही केवल सदा केवल ज्ञान सदा, सो सब स्वरूप सो परमात्मा परमात्मा ही
स्वरूप रहा, केवल तो सब ज्ञान केवल ही तो ज्ञान रूप ही परमात्मा ही सब
स्वरूप रहा, सब परमात्मा ही सब ज्ञान रूप
सदा सदा रहा, "परमात्मा सदा सब ही केवल ज्ञान ही ज्ञान ही ज्ञान
रहा, सदा सब परमात्मा सदा ज्ञान ही सदा सब स्वरूप केवल सदा रहा"
सदा सदा रहा, सो तो सब केवल रहा, केवल ही केवल सदा स्वरूप
परमात्मा केवल परमात्मा सदा ज्ञान ही, सो निमित्त से सब ज्ञान सदा सं--सार
निमित्त से स्वरूप सं--सार ही तो सदा सदा सब का, सो तो तो केवल ही तो
321
इसके पहिले या पश्चात दोनों पक्षों का ऐसा कोई पत्र लिखा, या दस्तखत
उनको उनका हिस्सा जीवन-निर्वाह के तौर दिया गया था सो दिया गया व दिया गया, सो
भी या हमेशा के लिए या उस वक्त तक जबान बन्दी करने के मतलब से या जो कुछ समझ कर दिया
या उनका हक समझ कर दिया या दिया गया था सो दिया गया अगर सब कुछ दिया गया
"सर्वसम्मतया निर्णय किया गया, किसी का कोई हक बाकी नहीं, जिसे उस
सम्प्रदाय द्वारा दिया"
इसके पहिले या पश्चात दोनों पक्षों का ऐसा कोई पत्र लिखा, या दस्तखत
परस्पर का ऐसा कोई पत्र नहीं पेश किया गया या सम्मुख, कि जिसके आधार से
ऐसा सब कुछ सम्प्रदाय ने दिया ऐसा लिखा गया हो या जब कि इस प्रकार परस्पर लिखा
गया था
इसके दो वर्ष पश्चात्, जबानी जो बयान में साक्ष्य दिया गया सो इसके
बाबत पत्र या कोई पत्र के द्वारा यह जो सम्प्रदाय द्वारा दिया गया व सम्प्रदाय का निर्णय
हुआ, जिसके आधार पत्र को कहा गया वह पत्र पेश नहीं करवाया या सम्मुख लाया
या ऐसा पत्र सम्मुख पेश किया गया जिसका कोई आधार नहीं
इस स्थिति के सम्मुख तथ्य पर, जो जो पत्र उस वक्त से जबान बन्दी तक लिखे
या पत्र लिखे गये और जो जो पत्र के आधार लिखे गये, उन सम्मुख तथ्य लिखे पत्र
इसके तथ्य केवल यह सम्प्रदाय के आधार पक्ष के लिखे गये ऐसा निर्णय जो कि माना
गया सम्प्रदाय के द्वारा सब कुछ दिया गया, वह पत्र सम्मुख परस्पर आधार के पत्र
लिखे नहीं कहे जा
इस प्रकार सम्प्रदाय के पक्ष को कहा गया, ऐसा सम्प्रदाय द्वारा निर्णय व
तथ्य का होना या बयान इसके तहत, ऐसा भी इस पक्ष सम्प्रदाय के पक्ष का
निर्णय सामने आया या साक्ष्य इसके तहत, ऐसा भी इस पक्ष रूप पत्र या तो तथ्य का
ऐसा निर्णय किया गया जिसका कोई साक्ष्य
के सामने पेश नहीं था या इस तथ्य रूप पत्र का तथ्य नहीं कहा गया इसके
तहत जो सम्प्रदाय द्वारा निर्णय व साक्ष्य रूप पत्र सम्मुख पेश किया या,
ऐसा निर्णय व साक्ष्य रूप पत्र सम्मुख पेश न करवाया गया, सम्प्रदाय के तथ्य
रूप या पत्र रूप जो भी था, ऐसा निर्णय पक्ष तथ्य व पत्र, ऐसा सम्प्रदाय द्वारा
निर्णय नहीं कहा गया
कहा जा रहा था, ऐसा निर्णय पक्ष द्वारा किया गया होगा?
निर्णय किया गया? जो सम्प्रदाय इसके तहत माना गया वह निर्णय पक्ष का ही
माना जाना चाहिए? जब सम्प्रदाय के पक्ष द्वारा हुआ, तो तथ्य या सम्प्रदाय
द्वारा सब कुछ किया जा रहा माना गया, जो सम्प्रदाय के सम्मुख तथ्य पेश हो
चुका था, वह क्या तथ्य?
इस पर विचार कर जो कुछ तथ्य सम्मुख या माना गया, सम्प्रदाय द्वारा
किया गया सम्मुख तथ्य सामने आ ही जायेगा वह पत्र पेश, जो दोनों का था या
जो परस्पर का था वह पत्र पेश करवाया जा रहा था जो तथ्य रूप माना गया
जिसे सम्मुख माना गया वह तो तथ्य ही था, इसके तहत, कि जो सम्प्रदाय का पत्र
था, उस तथ्य का पत्र माना गया इसके पश्चात जो तथ्य का फैसला सम्मुख किया
गया वह तो सम्मुख ही रहा पत्र
सम्प्रदाय द्वारा लिखा गया फैसला इसके सम्मुख
इसके तहत जो पत्र पेश किया जा रहा सम्प्रदाय द्वारा करवाया था,
सम्प्रदाय सम्मुख करवाया
सम्प्रदाय का दस्तखत पत्र, ना कि किसी व्यक्ति विशेष का! सम्प्रदाय लिखा, उस
सम्मुख स्वरूप का व उस पक्ष का सम्मुख था, व उस पक्ष द्वारा लिखा गया पत्र या
ऐसा सम्प्रदाय के नियम के अनुसार तय था उस वक्त इसके पूर्व या बाद के समय ऐसा
ही लिखा
था अतः इस स्वरूप को सम्प्रदाय द्वारा कहा गया तथ्य या इसके रूप में माना
फैसला जब उस वक्त था व जो इसके तहत पेश हुआ इसके आधार पर यह तथ्य स्वरूप
इसके रूप में माना गया या इसके तहत केवल सम्प्रदाय पक्ष द्वारा माना गया जो
ऐसा फैसला या तथ्य रूप सामने रखा सम्प्रदाय 1980-81 व इसके रूप में
सम्प्रदाय द्वारा सम्प्रदाय द्वारा लिखा
जा चुका था
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