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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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काम तो दोनों का काम रहा और उसका प्रभाव दोनों पर ही पड़े बिना रहता-सा जान पड़ा
किंवा मन व वचन दोनों रूप वाले ध्यान का फल।
सम्भाषण मात्र का ही यह फल हो सो बात नहीं पर मन का संकल्प मात्र
भी, पारस्परिक साक्षात्कार, अवलोकना, सम्भाषण बिना कितना प्रभाव उत्पन्न करता
बिना बोले; मन ही मन एकान्तरूप रूप से जो ज्ञान उत्पन्न किया जाता रहा
या ध्यान लगाया था, उस शक्ति का, उस ज्ञान किरण धारा का प्रभाव दोनों ओर
एक अनोखा आकस्मिक चमत्कार दिखा रहा था--सम्बोधन के पहिले रूप का जो
उपदेशात्मक कथन रहा सो--सम्बोधन के साथ, विशेष करके मन की ओर से;
जो कथन-श्रवण का विषय बनाया गया सो दोनों ओर ही समान रूप से
प्रभावित था, परिणामस्वरूप सो, दो भिन्न रूप वाले भिन्न दिशा में बह रहे मन के
प्रवाह एक ही स्थान पर एकत्रित होकर दो से एक बन कर अनन्त या असीम रूप
धारण कर गये जान पड़े ऐसा लगता
लगता तो था सम्बोधन इस पार बैठ कर किसी को पार--मन की ओर से
उपदेशात्मक कथन से, केवल कथन से मात्र सम्भाषण के द्वारा ही--सो सम्भाषण
भी साधारण-संसार व्यवहार जैसा या भिन्न प्रकार से साधारण-संसार-व्यवहार
स्वरूप का रूप लिये जो कथन किया गया था सो कुछ भी, चाहे मन चाहे वचन
रूप सम्भाषण या कथन-कथन के प्रभाव से बाहर कदापि कदापि बच न सका।
सम्भाषण रूप उपदेशात्मक कथन रूप जो वचन कहे गये! वे व्यर्थ न
गये... व केवल शब्द मात्र ही न होकर ज्ञान रूप, वचन रूप न होकर मन के
भीतर गहरे प्रभाव से सम्बन्धित हो पारस्परिक प्रभाव एक दूसरेपर अपना
प्रभाव दो रूप धारण कर दो ओर से सम्भाषण करने वालों के रूप में दो भिन्न
व्यक्तिगत रूप लिये हुए जो दो ज्ञान रूप व्यक्ति सम्भाषण कर रहे थे मन ही मन
रूप, सो केवल शब्द रूप न रह कर दोनों परस्पर एकमेक हो गये! केवल शब्द ही
परस्पर एकमेक होकर समाप्त नहीं हो गये थे या, केवल वचनों का रूप ही न
रहा! दोनों वचन से परे हो परे ही प्रभाव से परिपूर्ण होकर एकमेक हो गये
थे; केवल कथन रूप मन रूप का सम्भाषण ज्ञान रूप धारण कर ज्ञान का ज्ञान-में
समावेश हो ज्ञान रूप हो ज्ञान ही ज्ञान बनकर ज्ञान में लीन होकर एकमेक हो गये
थे, सो केवल मन ही तक बात या बात केवल कथन मात्र तक ही, या उपदेशात्मक कथन
तक ज्ञान कथन-कथन तक प्रभाव मात्र ही बन कर ज्ञान से विलग, ज्ञान से परे
ज्ञान कदापि
सत्य ही स्वरूप मात्र पर विचार किया जा सके सो बात नहीं, या सत्य ही
उपदेशात्मक रूप में परिणित हो, सत्य ज्ञान रूप सम्भाषण का रूपान्तर होकर
सत्य रूप बन कर ही सत्य रहा, मन रूप ज्ञान का, मन की शक्ति द्वारा सम्भाषण
ज्ञान द्वारा प्रभावित ज्ञान को रूप सत्य रूप से भिन्न कर जो सम्भाषण किया गया
केवल वह उपदेशात्मक था, जो कथन-कथन का कथन मात्र बनकर रह गया
अथवा प्रभाव रूप में परिणित होकर प्रभाव ही, ज्ञान रूप सम्भाषण का ज्ञान स्वरूप
हो, सत्य प्रभाव सम्मुख आ खड़ा हो ज्ञान रूप बना रहा हो, ज्ञान रूप प्रभाव ही
सम्भाषण ज्ञान का, सो प्रभाव रूप में ही सत्य रूप में परिणित
दोनों ओर रहा, मन ही मन सत्य रहा! हे ज्ञान, हे मन, हे सम्बोध मात्र; सब
ही परस्पर में विलीन जान पड़े!
"जो भी ज्ञान सम्मुख आ रहा था सो सब ज्ञान सत्य बनकर, सत्य ही का स्वरूप
रहा"
जो सामने था सब सो, सो ही सत्य था, जो सम्मुख रूप ज्ञान बनकर आ खड़ा
हुआ, सत्य स्वरूप ही सत्य बनकर, सत्य रूप का ज्ञान सम्मुख आ खड़ा हुआ ।
ज्ञान शब्द से परे होकर केवल ज्ञान ही, ज्ञान रूप ज्ञान व सम्मुख आ खड़ा ज्ञान
एक ही हो एक ही स्वरूप रूप बन गया; सो स्वरूप सम्मुख व सम्भाषण के प्रभाव
रूप ज्ञान था, जो ज्ञान होकर सम्मुख आ खड़ा
एक रूप हो ज्ञान का सम्बोधन का रूप धारण किया रहा! सम्बोधक या
सम्बोधित व्यक्ति का भेद न, भेद रूप ज्ञान रूप ज्ञान के सम्मुख ज्ञान रूप हो जाने
से, सब भेद सा, सम्बोधन का प्रभाव ही रूप बना सम्मुख आ रहा था।
"सब ही तो या तो सम्मुख रूप ज्ञान-स्वरूप का रूप बना रहा"
ज्ञान-ज्ञान रूप सम्बोधित किया गया सो, ज्ञान-ज्ञान ही रूप रहा
केवल मात्र शब्द ही न होकर सो, सो स्वरूप, सम्बोधन मात्र--सम्बोधक सम्बोधन रूप
सम्मुख बनकर सम्भाषण प्रभाव का रूप लिए हुए, केवल सम्भाषण, केवल ही
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