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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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Page 83

॥ अथ षोडशः सर्गः॥
सीताया विलापः
श्रीर मन्म हाराज्ये पराजयं प्राप
श्लोक 12
अहो मे मूढ चित्तं च गता या वै जनं प्रति।
गतं वा यद्भविष्यद्वा सर्वं वै जन जानतः॥
मम राम विहीनाया प्राणा मे हि यथा तथा॥
श्लोक 13
अहं मुग्धा यया रामं गत्वा वै वन मा विशे।
नरा नृपति राज्या च सर्वं वै जन जानतः॥
मम राम विहीनाया प्राणा मे हि यथा तथा॥
श्लोक 14
मया मन्द भाग्या च रामं मुक्त्वा वनं प्रति।
अहं च जन जानतः सर्वं वै जन जानतः॥
मम राम विहीनाया प्राणा मे हि यथा तथा॥
श्लोक 15
सती सीता महा भागा कृत्वा रोदन माकुला।
तदा सती वनं गत्वा रामं प्रति विचिन्तयन्॥
मम राम विहीनाया प्राणा मे हि यथा तथा॥
इस प्रकार श्री जानकी व्याकुल हो कर विलाप कर रही थी सीताजी कहती हैं, हे
राघव हम तुम्हारे बिना जीवित नहीं रहेंगे, ऐसा विलाप कर
वह कहती कभी तो कहती--हे लक्ष्मण जी तुमने हमारा वचन ना माना हो, दूसरा
कभी कहती हम क्या करें क हा जा एं, न जा ने क हा चले गये, कभी कहती त्रिजटा
तुम कहां गयी हमारा उपाय करो। हे त्रिजटा--हम को तुम्हारा सहारा था, तुम्हारी
शिक्षा मानते थे; न जा नें क हां, क हां, क हां--हम को संकट में छोड़ करके न जाने
अपनी कुटिया भीतर बैठ कर हमारा दुख रोती होगी या सोती हो, हमारी सुध
कभी नहीं ली।
कभी कहती हैं, हम अपने प्राण त्याग कर अपनी इस देह को मिटा
क्यों न दी जाय; उस क्षण में ही अपने मन को समझा करके शांत करती
और कहती, अभी देखना है।
थोड़ी देर पश्चात्, प्रभु श्री राम चन्द्र जी जब होश में
आ गये, तब कहने लगे; अब सब लोग आगे बढ़ो, आगे बढ़ कर उस
घर को घेर कर उस विभीषण को पकड़ कर बाहर ले आओ उसको, इस
का वध कर दिया जाय।
तब श्री राम चन्द्र की आज्ञा पाकर वानर दल सब एक साथ हो कर लंका
पर चढ़ाई करने लगे, तब विभीषण ने मन्दोदरी को सारा भेद समझा
कर
सब को बाहर कर दिया और खुद भी बाहर निकला और वानरों
पर बाणों की ऐसी वर्षा की कि वानर दल में भगदड़--मच गई तब
लक्ष्मण जी ने, श्री विभीषण का सामना किया।
दोनों का युद्ध होने लगा, दोनों ही महा बलवान थे, दोनों
अपनी अपनी माया रचने लगे कभी कोई बाण चलाता--तो, एक, दो, तीन... सौ
बाण--बना कर के चलाता, मेघ-नाद विभीषण सेना को मारता था।
जब यह हाल देखा, तब राम जी क्रोधित होकर के कहने लगे--अरे...
तू क्या ही समझता है, काल तेरा निकट आ गया; तूने जो हमारी भार्या
को हर लिया है तूने जो कपट किया, सब का बदला, तुझे अभी देता हूं। ऐसा कह--
कर... श्री रामचन्द्र जी ने अपने धनुष पर बाण चढ़ा कर विभीषण की छाती
पर मारा तो, मेघ ना द गिर पड़ा, मूर्छा आ गई विभीषण को तब सब वानर