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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

Ek Omkar Satnam (Japji Sahib and Saint Stories)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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यह बात पहले बतायी, उसने स्वीकार कर लिया फिर उसके मन रूपी दर्पण का
प्रसाद उसका पत्र--उत्तर का प्रति-संबोधन, उसने जो लिखा--उत्तर का उस पर क्या रूप
का असर होता गया उसका पत्र, तो वह उसके पास आया होगा... हे भगवान् वह कैसा
लिखा या उसने क्या लिखा था कि उस पत्र ने उसके उस रूप का दर्शन करा दिया
कि उसको पत्र फाड़ना पड़ा? तो वह समझेगा, उसने गाली--या क्रोध, तिरस्कार पूर्ण,
कठिन शब्द, चोट पहुँचाने, कठोर वचन, कु-शब्दाभिधान--का तो प्रयोग, गाली गलौज
करना ही था समझाना, गाली-गलौजपूर्ण शब्द उसने थोड़े लिखे होंगे? गाली या
इस तरह तिरस्कार युक्त या इस तरह अपमानजनक शब्द, उसने लिखे थे? उसने केवल उसके
भाव रूप दोष देखे होंगे लेकिन इस बात को लेकर वह उसको तिरस्कार पूर्वक गाली या भयंकर
शब्द क्यों कहेगा! या तो उसने, या उसने उसके प्रति, अपने प्रतिभाव व्यक्त किये
भगवान् की प्रकृति ऐसी रही, उस रूप स्वाभाविकता स्वीकार या त्याग का ऐसा
तप--साधना--प्रतीक एकांतवास काल रहा होगा कि आज की तरह या केवल
संसारियों की तरह या साधारण तौर पर कोई बात नहीं थी, जो भी था सत्य
पर खड़ा रहा होगा जिसका प्रभाव सत्य--का इतना गहरा पड़ा कि सामने का सारा अहंकार ही,
जो विपरीत खड़ा था उसको, या ऐसा समझें कि वह विपरीत खड़ा अहंकार
पिघलकर ही नीचे गिरना पड़ा।
सत्य ऐसा लगा, या कह दो प्रेम, कह दो ज्ञान, केवल जानने का रूप कह दो
या जो आज के शब्दों में कह दिया जाता है कि प्रेम जागा, उस भाव को प्रेम, उस या
समझा, या केवल ही कहा गया
भगवान् को तो उस महा-तपस्या स्वरूप का, जो उनका स्वरूप ही बन गया
होगा वह सत्य, केवल उस रूप में सत्य को जाना गया जो दोनों पक्षों पर था या कह
दो-समता का रूप था, उस सत्य रूपी दर्पण रूप में प्रभाव दिखाई दिया होगा, जो
सामने था उसी का स्वरूप या ज्ञान हुआ
उस समय भगवान् को उस अवस्था--रूप साधना से उस रूप महावत रूपी--ज्ञान
का रूप मिला या जो स्वरूप, उस समय, व्यक्तिगत स्थिति या रूप रहा था
सांसारिक स्थिति रूप था, त्याग के रूप का प्रभाव रूप समझ लो, स्वरूप के
रूप का ज्ञान था उस रूप में उसका या यह समझो, उस समय उसके रूप का प्रभाव
तो उस समय, या कहो उस रूप प्रभाव से! तो जो उस समय त्याग रूपी प्रभाव था
उस रूप में से, उस सांसारिक त्याग या स्वरूप परमात्मा का प्रभाव रूप या रूप,
भगवान् के स्वरूप रूप रूप में पड़ा
तो वह अज्ञानता त्याग का हो गया, या उस समय का अज्ञानता रूप का ज्ञान
भगवान् रूप या उस समय रूप या स्वरूप, उस समय, उस त्याग-के स्वरूप का रूप
एक लगा या रूप रहा जिसका प्रभाव था, लेकिन न तो, स्वरूप न तो, न ज्ञान का
ऐसा रूप, उस समय का उस रूप अथवा अहंता स्वरूप का प्रभाव रूप न पड़ कर जो
उस रूप ज्ञान, उस रूप ज्ञान रूप में था जो ज्ञान उस समय दिया-गया
उसी ज्ञान रूप में वह ज्ञान सत्य रूप में पड़ा
ज्ञान का रूप ज्ञान ही तो स्वरूप, उस स्वरूप के प्रभाव रूप दिया गया था,
व्यक्तिगत रूप का प्रभाव नहीं था उस समय रूप केवल उस ज्ञान रूप का प्रभाव
व्यक्तिगत स्थिति, केवल स्वरूप से ज्ञान रूप स्वरूपित रूप ज्ञान स्वरूप
सामने उसका स्वरूप स्वभाविक या स्वाभाविक रूप रूप दिखाई दिया, केवल उतना रूप
सामने त्याग रूप रहा या ज्ञान-त्याग या स्वरूप का स्वरूप, त्याग-त्याग रूप
व्यक्तिगत स्वरूप त्याग-त्याग का स्वरूप रूप स्वरूप, त्याग-त्याग व्यक्तिगत
रूप, केवल ही तो सत्य के उस रूप स्वरूप ज्ञान-सत्य रूपी दर्पण स्वरूप
था, त्याग-ज्ञान रूप प्रभाव का सत्य या अज्ञानता रूप से, ज्ञान सत्य रूप ज्ञान रूप
था, उस सत्य रूपी प्रभाव से उस या उस या उस त्याग-ज्ञान का, प्रभाव या
प्रभाव ही, स्वरूप से, स्वरूप से, उस रूप ज्ञान रूप था जो सत्य रूप में पड़ा
सामने जो ज्ञान रूप या प्रभाव था उस समय त्याग रूपी के रूप में, जो
स्वरूप रूप रहा या या उस स्वरूप से सत्य का स्वरूप ही ज्ञान प्रभाव था
केवल त्याग का, तो तो उस समय या या ज्ञान स्वरूप से या विपरीत त्याग का
स्वरूप ही तो केवल ज्ञान रूप रहा जो जो केवल त्याग रूपी--ज्ञान स्वरूप
ज्ञान रूप था, जो स्वरूप स्वरूप से, सत्य के स्वरूप ज्ञान रूप स्वरूप रूप--का
भगवान् स्वरूप ज्ञान के स्वरूप ज्ञान स्वरूप, व्यक्तिगत स्वरूप ही
व्यक्ति का स्वरूप अहंता रूप में उस रूप से ज्ञान रूप स्वरूप या जो
व्यक्ति स्वरूप ज्ञान या प्रभाव या ज्ञान से उस ज्ञान न हो सका, उस ही रूप
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